श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 23

 
श्लोक
नामोच्चारणमाहात्म्यं हरे: पश्यत पुत्रका: ।
अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
नाम—पवित्र नाम के; उच्चारण—उच्चारण का; माहात्म्यम्—उच्च स्थान; हरे:—परम ईश्वर का; पश्यत—जरा देखो; पुत्रका:—हे मेरे पुत्रवत् सेवको; अजामिल: अपि—अजामिल (जो महापापी था) भी; येन—जिसके कीर्तन से; एव— निश्चय ही; मृत्यु-पाशात्—मृत्यु की रस्सियों से; अमुच्यत—छूट गया ।.
 
अनुवाद
 
 हे मेरे पुत्रवत् सेवको! जरा देखो न, भगवन्नाम का कीर्तन कितना महिमायुक्त है! परम पापी अजामिल ने यह न जानते हुए कि वह भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण कर रहा है, केवल अपने पुत्र को पुकारने के लिए नारायण नाम का उच्चारण किया। फिर भी भगवान् के पवित्र नाम का उच्चारण करने से उसने नारायण का स्मरण किया और इस तरह से वह तुरन्त मृत्यु के पाश से बचा लिया गया।
 
तात्पर्य
 हरे कृष्ण मंत्र के कीर्तन की महत्ता के विषय में शोध करने की आवश्यकता नहीं है। अजामिल का इतिहास भगवान् के नाम की शक्ति तथा पवित्र नाम का निरन्तर उच्चारण करने वाले व्यक्ति के उच्च पद का यथेष्ठ प्रमाण है। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने परामर्श दिया है— हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

इस कलियुग में मुक्त होने के लिए जितने कर्मकाण्डों की आवश्यकता है उन्हें कोई सम्पन्न नहीं कर सकता। ऐसा कर पाना अत्यन्त कठिन है। अत: सारे शास्त्रों तथा आचार्यों ने संस्तुति की है कि इस युग में मनुष्य पवित्र नाम का कीर्तन करे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥