श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 26

 
श्लोक
एवं विमृश्य सुधियो भगवत्यनन्ते
सर्वात्मना विदधते खलु भावयोगम् ।
ते मे न दण्डमर्हन्त्यथ यद्यमीषां
स्यात् पातकं तदपि हन्त्युरुगायवाद: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; विमृश्य—विचार करके; सु-धिय:—वे जिनकी बुद्धि प्रखर है; भगवति—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में; अनन्ते—असीम; सर्व-आत्मना—प्राणप्रण से; विदधते—ग्रहण करते हैं; खलु—निस्सन्देह; भाव-योगम्—भक्तिमय सेवा की विधि; ते—ऐसे लोग; मे—मेरा; न—नहीं; दण्डम्—दण्ड के; अर्हन्ति—योग्य हैं; अथ—इसलिए; यदि—यदि; अमीषाम्—उनका; स्यात्—है; पातकम्—कोई पाप कर्म; तत्—वह; अपि—भी; हन्ति—नष्ट करता है; उरुगाय-वाद:— परमेश्वर के नाम का कीर्तन ।.
 
अनुवाद
 
 अत: इन सभी बातों पर विचार करते हुए बुद्धिमान लोग हर एक के हृदय में स्थित तथा समस्त शुभ गुणों की खान भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन की भक्ति को अपनाकर सारी समस्याओं को हल करने का निर्णय करते हैं। ऐसे लोग दण्ड देने के मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। सामान्यतया वे कभी कोई पापकर्म नहीं करते, किन्तु यदि वे भूलवश या मोहवश कभी कोई पापकर्म करते भी हैं, तो वे पापफलों से बचा लिये जाते हैं, क्योंकि वे सदैव हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर निम्नलिखित श्लोक उद्धृत करते हैं, जो ब्रह्मा द्वारा की गई स्तुतियों में से है (भागवत १०.१४.२९)—
अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय प्रसादलेशानुगृहीत एव हि।

जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य रूकोऽपि चिरंए विचिन्वन् ॥

तात्पर्य यह है कि वैदिक शास्त्र का अत्यन्त प्रकाण्ड पंडित तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अस्तित्त्व तथा उनके नाम, यश, गुण इत्यादि से पूरी तरह अनजान हो सकता है, जबकि कोई-कोई विद्वान न होते हुए भी भगवान् की स्थिति को समझ सकता है, यदि वह किसी तरह भक्ति में लगकर भगवान् का शुद्ध भक्त बन जाता है। इसीलिए यमराज द्वारा कहा गया यह श्लोक कहता है—एवं विमृश्य सुधियो भगवति—जो लोग भगवान् की प्रेमाभक्ति करते हैं, वे सुधिय: अर्थात् बुद्धिमान बन जाते हैं, किन्तु वैदिक पंडित के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि वह कृष्ण के नाम, यश तथा गुणों को नहीं समझता। शुद्ध भक्त वह है, जिसकी बुद्धि विमल होती है। वह सचमुच विचारवान् होता है, क्योंकि वह भगवान् की सेवा में किसी दिखावे के लिए नहीं, अपितु प्रेम से, मन, वचन तथा शरीर से लगा रहता है। अभक्तगण धर्म का दिखावा कर सकते हैं, किन्तु यह अधिक प्रभावशाली नहीं होता, क्योंकि वे दिखावे के लिए मन्दिर या गिरजाघर में जाते हैं, किन्तु सोचते कुछ और हैं। ऐसे व्यक्ति अपने धार्मिक कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं और यमराज द्वारा दण्डनीय होते हैं। किन्तु यदि कोई भक्त अपनी पुरानी आदतों के कारण अनिच्छा से या संयोगवश पापकर्म करता है, तो उसे क्षमा कर दिया जाता है। सङ्कीर्तन आन्दोलन की यही महत्ता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥