श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 27

 
श्लोक
ते देवसिद्धपरिगीतपवित्रगाथा
ये साधव: समद‍ृशो भगवत्प्रपन्ना: ।
तान्नोपसीदत हरेर्गदयाभिगुप्तान्
नैषां वयं न च वय: प्रभवाम दण्डे ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
ते—वे; देव—देवताओं; सिद्ध—तथा सिद्धलोक के वासियों द्वारा; परिगीत—गाई गयी; पवित्र-गाथा:—शुद्ध कथाएँ; ये—जो; साधव:—भक्तजन; समदृश:—समानदर्शी; भगवत्-प्रपन्ना:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शरणागत; तान्— उनको; न—नहीं; उपसीदत—पास जाना चाहिए; हरे:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; गदया—गदा से; अभिगुप्तान्—पूरी तरह सुरक्षित; न—नहीं; एषाम्—इनका; वयम्—हम; न च—तथा नहीं; वय:—असीम काल; प्रभवाम—समर्थ हैं; दण्डे—दण्ड देने में ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे प्रिय सेवको! ऐसे भक्तों के पास मत जाना, क्योंकि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों में पूरी तरह शरणागत हो चुके होते हैं। वे समदर्शी होते हैं और उनकी गाथाएँ देवताओं तथा सिद्धलोक के निवासियों द्वारा गाई जाती हैं। तुम लोग उनके निकट भी मत जाना। वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की गदा द्वारा सदैव रक्षित रहते हैं, इसलिए ब्रह्मा तथा मैं और काल भी उन्हें दण्ड देने में समर्थ नहीं हैं।
 
तात्पर्य
 वस्तुत: यमराज ने अपने सेवकों को आगाह किया, “मेरे प्रिय सेवको! इसके पूर्व भक्तों को तंग करने के लिए तुम चाहे जो भी करते रहे हो, किन्तु अब उसे बन्द कर दो। जिन भक्तों ने भगवान् के चरणकमलों में शरण ले रखी है तथा जो भगवन्नाम का निरन्तर कीर्तन करते हैं उनकी प्रशंसा देवता तथा सिद्धलोक के वासी तक करते हैं। वे भक्त इतने सम्माननीय तथा उच्च हैं कि भगवान् विष्णु उनकी रक्षा स्वयं अपने हाथ में गदा लेकर करते हैं। अत: इस बार जो तुमने
किया है उसकी उपेक्षा करते हुए आगे से कभी भी तुम ऐसे भक्त के पास मत जाना, अन्यथा तुम्हें भगवान् विष्णु की गदा द्वारा मार दिया जाएगा। अतएव यह मेरी चेतावनी है। भगवान् विष्णु अभक्तों को गदा तथा चक्र से दण्ड देते हैं। तुम लोग भक्तों के साथ छेड़छाड़ करके दण्ड का खतरा मत मोल लो। तुम्हीं नहीं, यदि ब्रह्मा को या मुझे भी उन्हें दण्ड देना हो तो भगवान् विष्णु हमें ही दण्ड देंगे। इसलिए अब इसके बाद भक्तों को कभी तंग मत करना।”
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥