श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 30

 
श्लोक
तत् क्षम्यतां स भगवान् पुरुष: पुराणो
नारायण: स्वपुरुषैर्यदसत्कृतं न: ।
स्वानामहो न विदुषां रचिताञ्जलीनां
क्षान्तिर्गरीयसि नम: पुरुषाय भूम्ने ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; क्षम्यताम्—क्षमा करने योग्य; स:—वह; भगवान्—परम पुरुषोत्तम भगवान्; पुरुष:—परम पुरुषोत्तम; पुराण:—सबसे प्राचीन; नारायण:—नारायण; स्व-पुरुषै:—अपने सेवकों द्वारा; यत्—जो; असत्—ढिठाई; कृतम्— सम्पन्न; न:—हमारा; स्वानाम्—हमारे ही लोगों का; अहो—हाय; न विदुषाम्—न जानते हुए; रचित-अञ्जलीनाम्—आपसे क्षमा माँगने के लिए हाथ जोड़े हुए; क्षान्ति:—क्षमाशीलता; गरीयसि—महिमामयी है; नम:—नमस्कार; पुरुषाय—पुरुष को; भूम्ने—परम तथा सर्वव्यापक ।.
 
अनुवाद
 
 [तब यमराज स्वयं को तथा अपने सेवकों को अपराधी मानते हुए, भगवान् से क्षमायाचना करते हुए इस प्रकार बोले] हे प्रभु! मेरे सेवकों ने निश्चित रूप से अजामिल जैसे वैष्णव को बन्दी बनाकर महान् अपराध किया है। हे नारायण, हे परम एवं पुरातन पुरुषोत्तम! आप हमें क्षमा कर दें। अपने अज्ञान के कारण हम अजामिल को आपके सेवक के रूप में नहीं पहचान सके और इस तरह हमने निश्चित रूप से महान् अपराध किया है। अतएव हम हाथ जोड़ कर आपसे क्षमा माँगते हैं। हे प्रभु! आप अत्यन्त दयालु हैं और सद्गुणों से सदैव पूर्ण रहते हैं। कृपया हमें क्षमा कर दें। हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
तात्पर्य
 यमराज ने अपने सेवकों द्वारा किये गये अपराध का भार अपने ऊपर ले लिया। यदि किसी प्रतिष्ठान का कोई सेवक कोई गलती करता है, तो प्रतिष्ठान उसकी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता है। यद्यपि यमराज अपराधों से ऊपर हैं, किन्तु व्यवहारत: उनकी अनुमति से ही उनके सेवक अजामिल को बन्दी बनाने गये थे, जो कि महान् अपराध
था। न्यायशास्त्र पुष्टि करता है भृत्यापराधे स्वामिनो दण्ड:—यदि सेवक कोई गलती करता है, तो स्वामी दंडनीय होता है, क्योंकि अपराध के लिए वही उत्तरदायी होता है। इस बात को गम्भीरता से लेते हुए यमराज ने अपने सेवकों सहित हाथ जोडक़र परम पुरुषोत्तम भगवान् नारायण से क्षमा करने के लिए प्रार्थना की।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥