श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 32

 
श्लोक
श‍ृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहु: ।
यथा सुजातया भक्त्या शुद्ध्येन्नात्मा व्रतादिभि: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
शृण्वताम्—सुनने वालों; गृणताम्—तथा कीर्तन करने वालों के; वीर्याणि—अद्भुत कार्य; उद्दामानि—पाप का निवारण करने में सक्षम; हरे:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के; मुहु:—सदैव; यथा—जिस प्रकार; सु-जातया—आसानी से समक्ष लाया गया; भक्त्या—भक्ति द्वारा; शुद्ध्येत्—शुद्ध किया जा सकता है; न—नहीं; आत्मा—हृदय तथा आत्मा; व्रत- आदिभि:—कर्मकाण्ड करने से ।.
 
अनुवाद
 
 जो व्यक्ति भगवन्नाम का निरन्तर श्रवण तथा कीर्तन करता है और भगवान् के कार्यों का श्रवण तथा कीर्तन करता है, वह बहुत ही आसानी से शुद्ध भक्ति पद को प्राप्त कर सकता है, जो उसके हृदय के मैल को शुद्ध करने वाला है। केवल व्रत रखने तथा वैदिक कर्मकाण्ड करने से ऐसी शुद्धि प्राप्त नहीं की जा सकती।
 
तात्पर्य
 मनुष्य भगवन्नाम के कीर्तन तथा श्रवण का अभ्यास आसानी से कर सकता है और इस तरह आध्यात्मिक जीवन में भावविभोर बन सकता है। पद्मपुराण का कथन है— नामापराधयुक्तानां नामान्येव हरन्त्यघम्।
अविश्रान्तिप्रयुक्तानि तान्येवार्थकराणि च ॥

यदि कोई व्यक्ति हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन अपराध सहित भी करता है, तो वह अविचल भाव से निरन्तर कीर्तन करते हुए अपराधों से बच सकता है। जो इसका अभ्यस्त हो जाता है, वह सदा शुद्ध दिव्य पद पर रहेगा जो पापफलों से अस्पृश्य है। शुकदेव गोस्वामी ने राजा परीक्षित से विशेष अनुरोध किया कि इस तथ्य को सावधानी से अंकित कर लें। किन्तु वैदिक कर्मकाण्डों को करने से कोई लाभ नहीं होता। ऐसे कार्य करने से मनुष्य उच्चतर लोकों को जा सकता है, किन्तु जैसा कि भगवद्गीता (९.२१) में कहा गया है—क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति—जब स्वर्गलोक में मनुष्य के भोग की अवधि समाप्त हो जाती है, क्योंकि उसके पुण्य कर्म सीमित होते हैं, तो उसे पृथ्वी पर लौटना होता है। इस तरह ब्रह्माण्ड में ऊपर-नीचे भ्रमण करते रहने का प्रयास करने से कोई लाभ नहीं है। इससे अच्छा तो भगवन्नाम का कीर्तन करना है, जिससे वह पूर्णतया शुद्ध हो सके और भगवद्धाम लौटने का पात्र बन सके। यही जीवन का उद्देश्य है और यही जीवन की सिद्धि है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥