श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 33

 
श्लोक
कृष्णाङ्‌घ्रिपद्ममधुलिण् न पुनर्विसृष्ट-
मायागुणेषु रमते वृजिनावहेषु ।
अन्यस्तु कामहत आत्मरज: प्रमार्ष्टु-
मीहेत कर्म यत एव रज: पुन: स्यात् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
कृष्ण-अङ्घ्रि-पद्म—कृष्ण के चरणकमलों का; मधु—शहद; लिट्—चाटने वाला; न—नहीं; पुन:—फिर; विसृष्ट— पहले से विरक्त; माया-गुणेषु—प्रकृति के भौतिक गुणों में; रमते—आनन्द लेना चाहता है; वृजिन-अवहेषु—दुखदायी; अन्य:—दूसरा; तु—फिर भी; काम-हत:—काम द्वारा विमोहित; आत्म-रज:—हृदय की पापपूर्ण छूत; प्रमार्ष्टुम्—स्वच्छ करने के लिए; ईहेत—सम्पन्न करता है; कर्म—कार्य; यत:—जिसके बाद; एव—निस्सन्देह; रज:—पापपूर्ण कर्म; पुन:—फिर; स्यात्—प्रकट होते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जो भक्तगण भगवान् कृष्ण के चरणकमलों के मधु को जो भक्तगण सदैव चाटते रहते हैं, वे उन भौतिक कर्मों की तनिक भी चिन्ता नहीं करते जो प्रकृति के तीन गुणों के अधीन सम्पन्न किये जाते हैं और जो केवल दु:खदायी होते हैं। दरअसल, भौतिक कर्मों में वापस आने के लिए भक्तगण कभी भी कृष्ण के चरणकमलों को नहीं छोड़ते। किन्तु अन्य लोग, जो भगवान् के चरणकमलों की सेवा की उपेक्षा करने तथा कामेच्छाओं से विमोहित होने से वैदिक कर्मकाण्डों में लिप्त रहते हैं, कभी-कभी प्रायश्चित्त के कर्म करते हैं। फिर भी अपूर्णरूप से शुद्ध होने से वे पुन:-पुन: पापकर्मों में लौट आते हैं।
 
तात्पर्य
 भक्त का कर्तव्य है कि हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करे। वह कभी अपराध सहित और कभी अपराधरहित होकर कीर्तन कर सकता है, किन्तु यदि वह इस विधि को गम्भीरता के साथ अपनाता है, तो उसे वह सिद्धि प्राप्त होगी जो प्रायश्चित्त के वैदिक कर्मकाण्डों द्वारा प्राप्त नहीं की जा सकती। जो लोग वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति आसक्त हैं, किन्तु भक्ति में विश्वास नहीं करते, जो प्रायश्चित्त का परामर्श देते हैं, किन्तु भगवन्नाम के कीर्तन
की प्रशंसा नहीं करते वे सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने से वञ्चित रहते हैं। इसलिए भक्तगण भौतिक भोग से पूर्णतया विरक्त रहकर कभी भी वैदिक कर्मकाण्ड के पक्ष में कृष्णभावनामृत का परित्याग नहीं करते। जो लोग कामवासनाओं के कारण वैदिक कर्मकाण्ड के प्रति आसक्त रहते हैं उन्हें बारम्बार भौतिक जगत के कष्ट उठाने पड़ते हैं। महाराज परीक्षित ने उनके कर्मों की तुलना कुञ्जर-शौच अर्थात् हाथी के स्नान करने से की है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥