श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 34

 
श्लोक
इत्थं स्वभर्तृगदितं भगवन्महित्वं
संस्मृत्य विस्मितधियो यमकिङ्करास्ते ।
नैवाच्युताश्रयजनं प्रतिशङ्कमाना
द्रष्टुं च बिभ्यति तत: प्रभृति स्म राजन् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
इत्थम्—ऐसी शक्ति का; स्व-भर्तृ-गदितम्—अपने स्वामी (यमराज) द्वारा बतलाया गया; भगवत्-महित्वम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तथा उनके नाम, यश, रूप तथा गुणों की अद्वितीय महिमा; संस्मृत्य—स्मरण करके; विस्मित-धिय:— जिनके मन विस्मित; यम-किङ्करा:—यमराज के सारे सेवक; ते—वे; न—नहीं; एव—निस्सन्देह; अच्युत-आश्रय जनम्—अच्युत अर्थात् कृष्ण के चरणकमलों पर शरण प्राप्त व्यक्ति; प्रतिशङ्कमाना:—सदैव भयभीत; द्रष्टुम्—देखने के लिए; च—तथा; बिभ्यति—भयभीत हैं; तत: प्रभृति—तब से प्रारम्भ करके; स्म—निस्सन्देह; राजन्—हे राजन् ।.
 
अनुवाद
 
 अपने स्वामी के मुख से भगवान् की अद्वितीय महिमा तथा उनके नाम, यश तथा गुणों के विषय में सुनकर यमदूत आश्चर्यचकित रह गये। तब से, जैसे ही वे किसी भक्त को देखते हैं, तो वे उससे डरते हैं और उसकी ओर फिर से देखने का साहस नहीं करते।
 
तात्पर्य
 इस घटना के बाद से यमदूतों ने भक्तों के पास जाने की विपत्ति-जनक
आदत त्याग दी है। यमदूतों के लिए भक्त विपत्ति-जनक होता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥