श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 4

 
श्लोक
यमदूता ऊचु:
कति सन्तीह शास्तारो जीवलोकस्य वै प्रभो ।
त्रैविध्यं कुर्वत: कर्म फलाभिव्यक्तिहेतव: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
यमदूता: ऊचु:—यमराज के दूतों ने कहा; कति—कितने; सन्ति—हैं; इह—इस जगत में; शास्तार:—नियंत्रक या शासक; जीव-लोकस्य—इस भौतिक जगत के; वै—निस्सन्देह; प्रभो—हे स्वामी; त्रै-विध्यम्—प्रकृति के तीन गुणों के अधीन; कुर्वत:—करते हुए; कर्म—कर्म; फल—फलों की; अभिव्यक्ति—अभिव्यक्ति के; हेतव:—कारण ।.
 
अनुवाद
 
 यमदूतों ने कहा : हे प्रभु! इस भौतिक जगत में कितने नियंत्रक या शासक हैं? प्रकृति के तीन गुणों (सतो, रजो तथा तमो गुणों) के अधीन सम्पन्न कर्मों के विविध फलों को प्रकट करने के लिए कितने कारण उत्तरदायी हैं?
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि वे यमदूत इतने निराश थे कि उन्होंने प्राय: क्रुद्ध होकर अपने स्वामी से पूछा कि क्या उनके अतिरिक्त और भी कई स्वामी हैं? यही नहीं, चूँकि यमदूत पराजित किये जा चुके थे और उनका स्वामी उनकी
रक्षा नहीं कर सका था, अत: वे यह कहना चाह रहे थे कि उन्हें ऐसे स्वामी की सेवा करने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई सेवक बिना पराजित हुए अपने स्वामी के आदेशों को पूरा नहीं कर सकता तो ऐसे शक्तिहीन स्वामी की सेवा करने से क्या लाभ?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥