श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  »  श्लोक 6

 
श्लोक
किन्तु शास्तृबहुत्वे स्याद्ब‍हूनामिह कर्मिणाम् ।
शास्तृत्वमुपचारो हि यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
किन्तु—लेकिन; शास्तृ—राज्यपालकों या निर्णायकों का; बहुत्वे—विविधता में; स्यात्—हो सकता है; बहूनाम्—अनेकों का; इह—इस जगत में; कर्मिणाम्—कर्म करने वाले पुरुषों का; शास्तृत्वम्—विभागीय व्यवस्था; उपचार:—प्रशासन; हि—निस्सन्देह; यथा—जिस तरह; मण्डल-वर्तिनाम्—विभागीय अध्यक्षों का ।.
 
अनुवाद
 
 यमदूतों ने आगे कहा : चूँकि कर्मी अनेक हैं, अतएव उनके न्याय करने वाले निर्णायक या शासक भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किन्तु जिस तरह एक केन्द्रीय सम्राट विभिन्न विभागीय शासकों को नियंत्रित करता है, उसी तरह सारे निर्णायकों के मार्गदर्शन हेतु एक परम नियन्ता होना चाहिए।
 
तात्पर्य
 सरकारी व्यवस्था में विभिन्न लोगों को न्याय दिलाने के लिए विभागीय अधिकारी हो सकते हैं, किन्तु कानून तो एक होना चाहिए और उस केन्द्रीय नियम को चाहिए कि हर एक को नियंत्रित करे। यमदूत इसकी कल्पना नहीं कर सके कि दो निर्णायक एक ही मामले में दो भिन्न-भिन्न निर्णय
दे सकते होंगे; इसलिए वे जानना चाहते थे कि केन्द्रीय निर्णायक कौन है? यमदूतों को विश्वास था कि अजामिल सबसे बड़ा पापी व्यक्ति है और यमराज उसे दण्ड देना चाहते थे, विष्णुदूतों ने उसे क्षमा कर दिया। यही उलझन थी जिसे यमदूत यमराज से स्पष्ट करा लेना चाहते थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥