श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 3: यमराज द्वारा अपने दूतों को आदेश  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 जैसाकि इस अध्याय में बतलाया गया है, यमदूत यमराज के पास पहुँचे तो यमराज ने विस्तार से भागवत धर्म अर्थात् भक्ति के धार्मिक नियमों की व्याख्या की। इस तरह यमराज ने उन यमदूतों को संतुष्ट किया जो अत्यधिक निराश हो गए थे। यमराज ने कहा, “यद्यपि अजामिल अपने पुत्र को पुकार रहा था, किन्तु उसने भगवान् नारायण के नाम का उच्चारण किया और नामोच्चारण की झलक मात्र से उसे विष्णुदूतों की तुरन्त ही संगति मिल गई जिन्होंने उसे तुम्हारे द्वारा बन्दी बनाये जाने के प्रयास से बचा लिया। यह बिल्कुल ठीक है। यह तथ्य है कि दृढ़ पापी व्यक्ति भी यदि भगवन्नाम का उच्चारण करता है, तो वह भले ही पूरी तरह अपराध से रहित न हो, दूसरा भौतिक जन्म नहीं लेता।”
भगवान् का नामोच्चार करने से अजामिल को विष्णु के चार दूत मिले। वे अति सुन्दर थे और तुरन्त ही उसे बचाने आये थे। अब यमराज उनका वर्णन करते हैं, “ये सभी विष्णुदूत उन भगवान् के शुद्ध भक्त होते हैं, जो इस विराट जगत के सृजन, पालन तथा संहार से सम्बन्धित परम पुरुष हैं। उन परमेश्वर के कार्यकलापों को जो आत्मनिर्भर हैं और भौतिक इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं न तो राजा इन्द्र, वरुण, शिव, ब्रह्मा, सप्तर्षि न ही मैं समझ सकता हूँ। भौतिक इन्द्रियों के द्वारा उनके विषय में किसी को ज्ञान नहीं मिल सकता। मायापति भगवान् में हर एक सौभाग्य के दिव्य गुण पाये जाते हैं और उस दृष्टि से उनके भक्त भी योग्य होते हैं। जो भक्त पतितात्माओं को इस जगत से बचाने के विषय में ही चिन्तित रहते हैं, वे बद्धात्माओं को बचाने के लिए विभिन्न स्थानों में जन्म लेते हैं। यदि कोई आध्यात्मिक जीवन में किंचित् रुचि रखता है, तो भगवद्भक्त कई तरह से उसकी रक्षा करते हैं।”

यमराज ने आगे कहा, “सनातन धर्म का सार अतीव गुह्य है। भगवान् के अतिरिक्त अन्य कोई इस गुह्य धर्म प्रणाली को मानव-समाज को नहीं दे सकता। यह तो भगवान् की कृपा है कि उनके शुद्ध भक्त दिव्य धर्म-प्रणाली को समझ सकते हैं। इन भक्तों में विशेषतया बारह महाजन हैं— ब्रह्मा, नारद मुनि, शिव, चारों कुमार, कपिल, मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्म, बलि, शुकदेव गोस्वामी तथा मैं। जैमिनि के नेतृत्व अन्य विद्वान पंडित इत्यादि प्राय: माया द्वारा प्रच्छन्न रहते हैं इसलिए वे त्रयी कहे जाने वाले तीनों वेदों—ऋग, यजुर् तथा साम की अलंकारमयी भाषा के प्रति न्यूनाधिक आकृष्ट होते हैं। इन तीनों वेदों के अलंकारमय शब्दों द्वारा मोहित लोग शुद्ध भक्त बनने के बजाय वैदिक कर्मकाण्डों में रुचि दिखलाते हैं। वे भगवन्नाम-कीर्तन की महिमा को नहीं समझ सकते। किन्तु बुद्धिमान लोग भगवान् की भक्ति ग्रहण करते हैं। जब वे निरपराध भगवन्नाम का कीर्तन करते हैं, तो वे मेरे आदेशों के अधीन नहीं रहते। यदि संयोगवश वे कोई पापकर्म करते भी हैं, तो वे भगवन्नाम के द्वारा रक्षित होते हैं, क्योंकि इसी में उनका स्वार्थ है। भगवान् के चारों अस्त्र, विशेषतया गदा तथा सुदर्शन चक्र, भक्तों की सदा रक्षा करते हैं। जो छल-कपट से रहित होकर भगवन्नाम का कीर्तन , श्रवण या स्मरण करता है, या जो भगवान् की स्तुति करता है, या उन्हें नमस्कार करता है, वह सिद्ध बन जाता है, जबकि भक्तिविहीन विद्वान व्यक्ति भी नरक में बुलाया जा सकता है।”

जब यमराज भगवान् तथा उनके भक्तों की महिमा का इस प्रकार वर्णन कर चुके तो शुकदेव गोस्वामी ने नाम-जप की शक्ति तथा प्रायश्चित्त के लिए वैदिक कर्मकाण्ड एवं पुण्यकर्म करने की व्यर्थता के विषय में आगे व्याख्या की।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥