श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 1-2

 
श्लोक
श्रीराजोवाच
देवासुरनृणां सर्गो नागानां मृगपक्षिणाम् ।
सामासिकस्त्वया प्रोक्तो यस्तु स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥ १ ॥
तस्यैव व्यासमिच्छामि ज्ञातुं ते भगवन् यथा ।
अनुसर्गं यया शक्त्या ससर्ज भगवान् पर: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-राजा उवाच—राजा ने कहा; देव-असुर-नृणाम्—देवताओं तथा मनुष्यों की; सर्ग:—सृष्टि; नागानाम्—नागों (सर्प जैसे जीव) के; मृग-पक्षिणाम्—पशुओं तथा पक्षियों के; सामासिक:—संक्षेप में; त्वया—तुम्हारे द्वारा; प्रोक्त:—वर्णित; य:—जो; तु—किन्तु; स्वायम्भुवे—स्वायम्भुव मनु की; अन्तरे—अवधि में; तस्य—उसके; एव—निस्सन्देह; व्यासम्— विस्तृत वर्णन; इच्छामि—चाहता हूँ; ज्ञातुम्—जानने के लिए; ते—तुमसे; भगवन्—हे प्रभु; यथा—साथ ही; अनुसर्गम्— गौण सृष्टि; यया—जिस; शक्त्या—शक्ति से; ससर्ज—उत्पन्न किया; भगवान्—भगवान् से; पर:—दिव्य ।.
 
अनुवाद
 
 वर प्राप्त राजा ने शुकदेव गोस्वामी से कहा : हे प्रभु! देवता, असुर, मनुष्य, नाग, पशु तथा पक्षी स्वायम्भुव मनु के शासन काल में उत्पन्न किये गये थे। आपने इस सृष्टि के विषय में संक्षेप में (तृतीय स्कन्ध में) कहा है। अब मैं इसके विषय में विस्तार से जानना चाहता हूँ। मैं भगवान् की उस शक्ति के विषय में भी जानना चाहता हूँ जिससे उन्होंने गौण सृष्टि की।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥