श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 10

 
श्लोक
यूयं च पित्रान्वादिष्टा देवदेवेन चानघा: ।
प्रजासर्गाय हि कथं वृक्षान्निर्दग्धुमर्हथ ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
यूयम्—तुम सब; च—भी; पित्रा—अपने पिता द्वारा; अन्वादिष्टा:—आदेश दिये गये; देव-देवेन—स्वामियों के भी स्वामी भगवान् द्वारा; च—भी; अनघा:—हे निष्पाप; प्रजा-सर्गाय—सन्तान उत्पन्न करने के लिए; हि—निस्सन्देह; कथम्—कैसे; वृक्षान्—वृक्षों को; निर्दग्धुम्—जलाकर भस्म करने के लिए; अर्हथ—समर्थ हैं ।.
 
अनुवाद
 
 हे शुद्ध हृदयवाले! तुम्हारे पिता प्राचीनबर्हि तथा भगवान् ने तुम सबों को प्रजा उत्पन्न करने का आदेश दिया है। अत: तुम लोग इन वृक्षों तथा वनस्पतियों को किस तरह जलाकर भस्म कर सकते हो जिनकी आवश्यकता तुम्हारी प्रजा तथा तुम्हारे वंशजों के पालन के लिए पड़ेगी?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥