श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 13

 
श्लोक
अन्तर्देहेषु भूतानामात्मास्ते हरिरीश्वर: ।
सर्वं तद्धिष्ण्यमीक्षध्वमेवं वस्तोषितो ह्यसौ ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
अन्त: देहेषु—शरीरों (हृदयों) के भीतर; भूतानाम्—सारे जीवों के; आत्मा—परमात्मा; आस्ते—निवास करता है; हरि:— भगवान्; ईश्वर:—स्वामी या निदेशक; सर्वम्—समस्त; तत्-धिष्ण्यम्—उसका आवास स्थान; ईक्षध्वम्—देखने का प्रयास करते हैं; एवम्—इस प्रकार; व:—तुमसे; तोषित:—तुष्ट; हि—निस्सन्देह; असौ—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् सारे जीवों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, चाहे वे चर हों या अचर। इनमें मनुष्य, पक्षी, पशु, वृक्ष तथा सारे जीव सम्मिलित हैं। इसलिए तुम लोगों को प्रत्येक शरीर को भगवान् का वासस्थान या मन्दिर मानना चाहिए। इस दृष्टिकोण से तुम लोग भगवान् को तुष्ट कर सकोगे। तुम लोगों को क्रोध में आकर वृक्षों रूपों में स्थित इन जीवों का वध नहीं करना चाहिए।
 
तात्पर्य
 जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है और समस्त वैदिक शास्त्रों द्वारा पुष्टि की गई है—ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति—परमात्मा हर एक के हृदय में स्थित है। चूँकि हर एक का शरीर भगवान् का निवास है, अतएव व्यर्थ
के द्वेष से शरीर का विनाश नहीं करना चाहिए। इससे परमात्मा असन्तुष्ट होगा। सोम ने प्रचेताओं को यह बतलाया, क्योंकि उन्होंने परमात्मा को तुष्ट करने का प्रयास किया था, किन्तु अब उन्हें चाहिए कि उसे असन्तुष्ट न करें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥