श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 18

 
श्लोक
यथा ससर्ज भूतानि दक्षो दुहितृवत्सल: ।
रेतसा मनसा चैव तन्ममावहित: श‍ृणु ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस तरह; ससर्ज—उत्पन्न किया; भूतानि—जीवों को; दक्ष:—दक्ष ने; दुहितृ-वत्सल:—अपनी पुत्रियों के प्रति अतीव स्नेहिल; रेतसा—वीर्य से; मनसा—मन से; च—भी; एव—निस्सन्देह; तत्—वह; मम—मुझसे; अवहित:— सावधान होकर; शृणु—सुनो ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : कृपया अत्यन्त ध्यानपूर्वक मुझसे सुनें कि किस तरह प्रजापति दक्ष ने, जो अपनी पुत्रियों के प्रति अति स्नेहिल थे, अपने वीर्य से तथा मन से विभिन्न प्रकार के जीवों को उत्पन्न किया।
 
तात्पर्य
 दुहितृ-वत्सल: शब्द सूचित करता है कि सारी प्रजा दक्ष की पुत्रियों से उत्पन्न हुई। श्री
विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि इससे प्रतीत होता है कि दक्ष के कोई पुत्र न था।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥