श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 26

 
श्लोक
यदोपरामो मनसो नामरूप-
रूपस्य द‍ृष्टस्मृतिसम्प्रमोषात् ।
य ईयते केवलया स्वसंस्थया
हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नम: ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब समाधि में; उपराम:—पूर्ण विराम; मनस:—मन का; नाम-रूप—भौतिक नाम तथा रूप; रूपस्य—उसका जिससे वे प्रकट होते हैं; दृष्ट—भौतिक दृष्टि का; स्मृति—तथा स्मरण का; सम्प्रमोषात्—विनाश के कारण; य:—जो (भगवान्); ईयते—अनुभव किया जाता है; केवलया—आध्यात्मिक; स्व-संस्थया—अपने आदि रूप से; हंसाय—परम विशुद्ध को; तस्मै—उस; शुचि-सद्मने—जो आध्यात्मिक अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में ही अनुभव किया जाता है; नम:— मैं सादर नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 जब मनुष्य की चेतना स्थूल तथा सूक्ष्म भौतिक जगत के कल्मष से पूरी तरह शुद्ध हो जाती है और कार्य करने तथा स्वप्न देखने की अवस्थाओं से विचलित नहीं होती तथा जब मन सुषुप्ति अर्थात् गहरी नीद में लीन नहीं होता तो वह समाधि के पद को प्राप्त होता है। तब उसकी भौतिक दृष्टि तथा मन की स्मृतियाँ, जो नामों तथा रूपों को प्रकट करती हैं, विनष्ट हो जाती हैं। केवल ऐसी ही समाधि में भगवान् प्रकट होते हैं। अत: हम उन भगवान् को नमस्कार करते हैं, जो उस अकलुषित दिव्य अवस्था में देखे जाते हैं।
 
तात्पर्य
 ईश-साक्षात्कार की दो अवस्थाएँ हैं। एक सुज्ञेयम् कहलाती है, अर्थात् जो आसानी से समझ में आ जाये (सामान्य तथा मानसिक चिन्तन से) तथा दूसरी दुर्ज्ञेयम् कहलाती है, जो कठिनाई से ही समझी जाती है। परमात्मा के साक्षात्कार तथा ब्रह्म के साक्षात्कार को सुज्ञेयम् माना जाता है, किन्तु भगवान् का साक्षात्कार दुर्ज्ञेयम् है। जैसाकि यहाँ पर वर्णन किया गया है जब मनुष्य मन के कार्यों को—सोचने, अनुभव करने तथा इच्छा करने को त्याग—देता है अथवा दूसरे शब्दों में, जब मानसिक चिन्तन रुक जाता है, तो उसे भगवान् का साक्षात्कार होता है। यह दिव्य साक्षात्कार या अनुभूति सुषुप्ति अर्थात् गहरी निद्रा से भी ऊपर है। हम अपनी स्थूल बद्धावस्था में वस्तुओं को भौतिक अनुभव तथा स्मृति के द्वारा इन्द्रियगोचर करते हैं और सूक्ष्म अवस्था में हम जगत की अनुभूति स्वप्न में करते हैं। देखने की विधि में स्मृति भी निहित रहती है और वह सूक्ष्म रूप में भी विद्यमान रहती है। स्थूल अनुभव तथा स्वप्नों के ऊपर सुषुप्ति है और जब कोई सुषुप्ति को लाँघकर पूर्णतया आध्यात्मिक पद को प्राप्त होता है, तो उसे समाधि, विशुद्ध सत्त्व या वसुदेव सत्त्व प्राप्त होता है, जिसमें भगवान् के दर्शन होते हैं।
अत: श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियै:—जब तक कोई द्विधा में, ऐन्द्रिय पद पर, जो स्थूल हो या सूक्ष्म, स्थित रहता है, तब तक आदि भगवान् का साक्षात्कार असम्भव है। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यद:, किन्तु जब कोई अपनी इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में लगाता है—विशेषतया जब वह अपनी जीभ को हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करने में लगाता है तथा वह सेवाभाव से केवल कृष्ण-प्रसाद का आस्वादन करने में लगा रहता है, तो भगवान् प्रकट होते हैं। इसका संकेत इस श्लोक में शुचि सद्मने शब्दों से होता है। शुचि का अर्थ है “शुद्ध”। अपनी इन्द्रियों से सेवा करने के भाव से मनुष्य का सारा जीवन शुचिसद्म अर्थात् अकलुषित शुद्धि का पद बन जाता है। इसलिए दक्ष भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं, जो शुचिसद्म के पद पर प्रकट होते हैं। इस सन्दर्भ में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रीमद्भागवत (१०.१४.६) से ब्रह्मा की यह स्तुति उद्धृत करते हैं—तथापि भूमन् महिमागुणस्य ते विबोद्धुमर्हत्यम-लान्तरात्मभि:—हे प्रभो! जिसका हृदय पूर्णतया शुद्ध हो चुका है, वही आपके दिव्य गुणों का तथा आपके कार्यों की महानता को समझ सकता है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥