श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 27-28

 
श्लोक
मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं
स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भ‍ि: ।
वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं
मनीषया निष्कर्षन्ति गूढम् ॥ २७ ॥
स वै ममाशेषविशेषमाया
निषेधनिर्वाणसुखानुभूति: ।
स सर्वनामा स च विश्वरूप:
प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्ति: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
मनीषिण:—महान् विद्वान ब्राह्मण जो अनुष्ठानों तथा यज्ञों को सम्पन्न करे; अन्त:-हृदि—हृदय के भीतर; सन्निवेशितम्— स्थित होते हुए; स्व-शक्तिभि:—अपनी आध्यात्मिक शक्तियों से; नवभि:—नौ भिन्न-भिन्न भौतिक शक्तियों से भी (प्रकृति, पूर्ण भौतिक शक्ति, अहंकार, मन तथा पाँच इन्द्रिय विषय); च—और (पांच स्थूल भौतिक तत्त्वों तथा दस कार्येन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय); त्रिवृद्भि:—प्रकृति के तीनों भौतिक गुणों द्वारा; वह्निम्—अग्नि; यथा—जिस तरह; दारुणि— काष्ठ के भीतर; पाञ्चदश्यम्—सामिधेनि मंत्र नामक पन्द्रह मंत्रों के उच्चारण से उत्पन्न; मनीषया—शुद्ध बुद्धि द्वारा; निष्कर्षन्ति—निचोड़ते हैं; गूढम्—यद्यपि प्रकट न करते हुए; स:—भगवान्; वै—निस्सन्देह; मम—मेरे प्रति; अशेष— समस्त; विशेष—किस्में; माया—माया की; निषेध—निषेध विधि द्वारा; निर्वाण—मुक्ति का; सुख-अनुभूति:—जो दिव्य आनन्द द्वारा अनुभव किया जाता है; स:—भगवान्; सर्व-नामा—सभी नामों का स्रोत; स:—वह, भगवान्; च—भी; विश्व-रूप:—ब्रह्माण्ड का विराट रूप; प्रसीदताम्—दयालु हो; अनिरुक्त—अचिन्त्य; आत्म-शक्ति:—समस्त आध्यात्मिक शक्तियों का आगार ।.
 
अनुवाद
 
 जिस तरह कर्मकाण्ड तथा यज्ञ करने में निपुण प्रकांड विद्वान ब्राह्मण पन्द्रह सामिधेनी मंत्रों का उच्चारण करके काष्ठ के भीतर सुप्त अग्नि को बाहर निकाल सकते हैं और इस तरह वैदिक मंत्रों की दक्षता को सिद्ध करते हैं, उसी तरह जो लोग कृष्णभावनामृत में वस्तुत: बढ़े-चढ़े होते हैं—दूसरे शब्दों में, जो कृष्णभावनाभावित होते हैं—वे परमात्मा को ढूँढ सकते हैं, जो अपनी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा हृदय के भीतर स्थित रहते हैं। हृदय प्रकृति के तीनों गुणों से तथा नौ भौतिक तत्त्वों (प्रकृति, कुल भौतिक शक्ति, अहंकार, मन तथा इन्द्रिय तृप्ति के पाँचों विषय) एवं पाँच भौतिक तत्त्वों तथा दस इन्द्रियों द्वारा आच्छादित रहता है। ये सत्ताईस तत्त्व मिलकर भगवान् की बहिरंगा शक्ति का निर्माण करते हैं। बड़े बड़े योगी भगवान् का ध्यान करते हैं, जो परमात्मा रूप में हृदय के भीतर स्थित हैं। वह परमात्मा मुझ पर प्रसन्न हों। जब कोई भौतिक जीवन की असंख्य विविधताओं से मुक्ति के लिए उत्सुक होता है, तो परमात्मा का साक्षात्कार होता है। वस्तुत: उसे ऐसी मुक्ति तब मिलती है जब वह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाता है और अपनी सेवा प्रवृत्ति के कारण भगवान् का साक्षात्कार करता है। भगवान् को उन अनेक आध्यात्मिक नामों से सम्बोधित किया जा सकता है, जो भौतिक इन्द्रियों के लिए अकल्पनीय हैं। वे भगवान् मुझ पर कब प्रसन्न होंगे?
 
तात्पर्य
 इस श्लोक की टीका करते हुए श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर दुर्विज्ञेयम् शब्द का प्रयोग करते हैं जिसका अर्थ है “समझने में अति कठिन।” भगवद्गीता (७.२८) में जीवन की शुद्ध अवस्था का वर्णन हुआ है, जिसमें कृष्ण कहते हैं—
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता: ॥

“जिन मनुष्यों ने पूर्वजन्मों में तथा इस जन्म में पुण्यकर्म किये हैं और जिनके पापकर्मों का पूर्णतया उच्छेदन हो चुका होता है, वे मोह के द्वन्द्वों से मुक्त हो जाते हैं और संकल्पपूर्वक मेरी सेवा में तत्पर होते हैं।”

भगवद्गीता में ही अन्यत्र (९.१४) भगवान् कहते हैं—

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥

“ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए, दृढ़ संकल्प के साथ प्रयास करके, मुझे नमस्कार करते हुए, भक्तिभाव से निरन्तर मेरी पूजा करते हैं।”

मनुष्य समस्त भौतिक अवरोधों को लाँघने के बाद भगवान् को समझ सकता है। इसलिए भगवान् कृष्ण ने गीता (७.३) में यह भी कहा है—

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत: ॥

“कई हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि के लिए प्रयत्नशील होता है और इस तरह सिद्धि प्राप्त करने वालों में से मुश्किल से कोई एक मुझे वास्तव में जान पाता है।” भगवान् कृष्ण को समझ पाने के लिए मनुष्य को कठिन तपस्या करनी होती है, किन्तु भक्ति का मार्ग पूर्ण है, अतएव इस विधि का पालन करने से मनुष्य आसानी से आध्यात्मिक पद को प्राप्त करके भगवान् को समझ सकता है। इसकी भी पुष्टि भगवद्गीता (१८.५५) में हुई है जहाँ कृष्ण कहते हैं—

भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मा तत्त्वतो ज्ञात्वा वशते तदनन्तरम् ॥

“केवल भक्ति से मुझ भगवान् को यथारूप में जाना जा सकता है। और जब मनुष्य ऐसी भक्ति में पूर्णतया भावनाभावित हो जाता है, तो वह वैकुण्ठलोक में प्रवेश कर सकता है।” इस तरह यद्यपि विषय दुर्विज्ञेयम् अर्थात् समझ पाने में अतीव मुश्किल है, किन्तु निर्धारित विधि का पालन करने से यह आसान बन जाता है। भगवान् का सम्पर्क शुद्ध भक्ति के माध्यम से ही सम्भव है, जिसकी शुरुआत श्रवणं कीर्तनं विष्णो: से होती है। इस सन्दर्भ में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर श्रीमद्भागवत का यह श्लोक (२.८.५) उद्धृत करते है—प्रविष्ट: कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम्। श्रवण तथा कीर्तन की विधि हृदय के भीतर प्रवेश करती है और इस तरह मनुष्य शुद्ध भक्त बन जाता है। इस विधि को चालू रखने पर वह दिव्य प्रेम की अवस्था को प्राप्त होता है और तब वह भगवान् के दिव्य नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं का प्रशंसक बन जाता है। दूसरे शब्दों में, भक्ति द्वारा शुद्ध भक्त भगवान् की विविध शक्तियों के रूप में अनेक भौतिक अवरोधों के आने पर भी भगवान् का दर्शन करने में समर्थ होता है। भक्त इन अवरोधों के बीच आसानी से गुजरता हुआ भगवान् के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आता है। आखिर, इन श्लोकों में वर्णित भौतिक अवरोध भगवान् की विविध शक्तियाँ ही तो होती हैं। जब भक्त भगवान् का दर्शन करने के लिए उत्सुक होता है, तो वह उनसे प्रार्थना करता है—

अपि नन्दतनुज किंकरं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।

कृपया तव पादपंकजस्थितधूलीसदृशं विचिन्तय ॥

“हे महाराज नन्द के पुत्र (कृष्ण)! मैं आपका नित्य सेवक हूँ फिर भी न जाने कैसे मैं जन्म- मृत्यु के सागर में गिर गया हूँ! कृपया मुझे इस मृत्यु के सागर से निकालकर अपने चरणकमलों पर एक धूलि कण के रूप में रख लीजिये।” भगवान् भक्त पर प्रसन्न होकर उसके सारे भौतिक अवरोधों को आध्यात्मिक सेवा में बदल देते हैं। इस सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर विष्णु पुराण का यह श्लोक उद्धृत करते हैं—

ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित् त्वय्येका सर्वसंस्थितौ।

ह्लादतापकरी मिश्रा त्वयि नो गुणवर्जिते ॥

भौतिक जगत में भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति तापकरी अर्थात् “कष्ट देने वाली” के रूप में प्रकट होती है। हर कोई सुख के लिए लालायित रहता है, किन्तु सुख जो कि भगवान् की ह्लादिनी शक्ति से मूलत: उत्पन्न होता है, भौतिक जगत में भौतिक कार्यों के कारण भगवान् की यह ह्लादिनी शक्ति दुख का कारण (ह्लादतापकरी) बन जाती है। भौतिक जगत में मिथ्या सुख ही दुख का कारण है, किन्तु जब सुख के लिए किये गये प्रयत्न भगवान् की तुष्टि की दिशा में निर्देशित होते हैं, तो दुख का यह तापकरी तत्त्व समाप्त हो जाता है। इस सम्बन्ध में जो उदाहरण दिया जाता है, वह है कि काठ से अग्नि उत्पन्न करना अतीव कठिन है, किन्तु जब अग्नि उत्पन्न हो जाती है, तो वह काठ को भी भस्म कर देती है। दूसरे शब्दों में, जो लोग भक्ति से रहित हैं उनके लिए भगवान् की अनुभूति कर पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु भक्त के लिए हर काम सरल हो जाता है और इस तरह वह भगवान् से सरलता से मिल सकता है।

यहाँ पर ये स्तुतियाँ बतलाती हैं कि भगवान् का स्वरूप भौतिक स्वरूप की सीमा के परे है, अतएव वह अचिन्त्य है। किन्तु भक्त तो यह प्रार्थना करता है, “हे प्रभु! आप मुझसे प्रसन्न हों जिससे मैं आपके दिव्य रूप तथा शक्ति का सरलता से दर्शन कर सकूँ।” अभक्त गण नेति नेति के वादविवाद द्वारा परब्रह्म को समझने का प्रयास करते हैं। निषेधनिर्वाणसुखानुभूति:—किन्तु भक्त एकमात्र भगवन्नाम का कीर्तन करके ऐसे श्रमसाध्य चिन्तन से अपने को दूर रखता है और सरलता से भगवान् की अनुभूति करता है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥