श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 30

 
श्लोक
यस्मिन्यतो येन च यस्य यस्मै
यद्यो यथा कुरुते कार्यते च ।
परावरेषां परमं प्राक् प्रसिद्धं
तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
यस्मिन्—जिसमें (भगवान् या परम धाम में); यत:—जिससे (हर वस्तु उद्भूत है); येन—जिसके द्वारा (हर वस्तु निर्मित है); च—भी; यस्य—जिसकी (हर वस्तु है); यस्मै—जिसको (हर वस्तु अर्पित की जाती है); यत्—जो; य:—जो; यथा—जिस तरह; कुरुते—सम्पन्न करता है; कार्यते—कराया जाता है; च—भी; पर-अवरेषाम्—भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों में; परमम्—परम; प्राक्—उद्गम; प्रसिद्धम्—हर एक को भलीभाँति ज्ञात; तत्—वह; ब्रह्म— परब्रह्म; तत् हेतु:—समस्त कारणों के कारण; अनन्यत्—अन्य कारण न होते हुए; एकम्—अद्वितीय ।.
 
अनुवाद
 
 परब्रह्म कृष्ण प्रत्येक वस्तु के परम आश्रय तथा उद्गम हैं। हर कार्य उन्हीं के द्वारा किया जाता है, हर वस्तु उन्हीं की है और हर वस्तु उन्हीं को अर्पित की जाती है। वे ही परम लक्ष्य हैं और चाहे वे स्वयं कार्य करते हों या अन्यों से कराते हों, वे परम कर्ता हैं। वैसे उच्च तथा निम्न अनेक कारण हैं, किन्तु समस्त कारणों के कारण होने से वे परब्रह्म कहलाते हैं, जो समस्त कार्यकलापों के पहले से विद्यमान थे। वे अद्वितीय हैं और उनका कोई अन्य कारण नहीं है। मैं उनको सादर प्रणाम करता हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवान् कृष्ण आदि कारण हैं जैसा कि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है (अहं सर्वस्य प्रभव:)। यहाँ तक कि यह भौतिक जगत, जो प्रकृति के गुणों के अधीन संचालित होता है, भगवान् द्वारा उत्पन्न किया जाता है; इसलिए भौतिक जगत से भी उनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। यदि भौतिक जगत उनके शरीर का अंश न होता तो परम कारण स्वरूप भगवान् अपूर्ण होते। इसलिए हम सुनते हैं—वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:—यदि कोई जान लेता है कि वासुदेव ही समस्त कारणों के आदि कारण हैं, तो वह पूर्ण महात्मा बन जाता है।
ब्रह्म-संहिता (५.१) घोषित करती है—

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्द विग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“गोविन्द कहे जाने वाले कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबों के उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं, क्योंकि वे समस्त कारणों के आदि कारण हैं।” परब्रह्म (तद्ब्रह्म) समस्त कारणों के कारण हैं, किन्तु उनका कोई कारण नहीं है। अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकराणकारणम्—गोविन्द अर्थात् कृष्ण समस्त कारणों के कारण हैं, किन्तु गोविन्द रूप में उनके प्राकट्य का कोई कारण नहीं है। गोविन्द विविध रूपों में विस्तार करते हैं फिर भी वे सारे रूप एक हैं। जैसाकि मध्वाचार्य ने पुष्टि की है—अनन्य: सदृशाभावाद् एको रूपाद्यभेदत:—कृष्ण का न तो कोई कारण है न कोई सादृश्य। वे एक हैं, क्योंकि उनके विविध रूप—यथा स्वांश तथा विभिन्नांश—उनसे अभिन्न हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥