श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 4

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
यदा प्रचेतस: पुत्रा दश प्राचीनबर्हिष: ।
अन्त:समुद्रादुन्मग्ना दद‍ृशुर्गां द्रुमैर्वृताम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; यदा—जब; प्रचेतस:—प्रचेताओं ने; पुत्रा:—पुत्र; दश—दस; प्राचीनबर्हिष:—राजा प्राचीन बर्हि के; अन्त:-समुद्रात्—समुद्र के भीतर से; उन्मग्ना:—बाहर आये; ददृशु:—उन्होंने देखा; गाम्—सम्पूर्णलोक को; द्रुमै: वृताम्—वृक्षों से आवृत ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब प्राचीनबर्हि के दसों पुत्र उस जल से बाहर निकले जिसमें वे तपस्या कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि संसार की समूची सतह वृक्षों से ढक गई है।
 
तात्पर्य
 जब राजा प्राचीनबर्हि वैदिक अनुष्ठान कर रहा था जिसमें पशुओं की हत्या की संस्तुति की गई थी तो नारद मुनि ने दयावश उसे सलाह दी कि इस अनुष्ठान को रोक दे। प्राचीनबर्हि नारद की बात भलीभाँति समझ गया, अत: वह राज्य छोडक़र तपस्या करने के लिए जंगल चला गया। किन्तु उसके दस पुत्र जल के भीतर तपस्या कर रहे थे, अतएव संसार की व्यवस्था देखने वाला कोई न था। जब दसों पुत्र, प्रचेतागण, जल से बाहर आये तो उन्होंने देखा कि पृथ्वी वृक्षों से ढक गई है।
जब सरकार कृषि की उपेक्षा करती है, जो अन्न उत्पादन के लिए आवश्यक है, वह भूमि व्यर्थ के वृक्षों से ढक जाती है। निस्सन्देह, अनेक वृक्ष उपयोगी होते हैं, क्योंकि वे फल-फूल उत्पन्न करते हैं, किन्तु दूसरे अनेक वृक्ष अनावश्यक होते हैं। उनका उपयोग ईंधन के लिए किया जा सकता है और भूमि को साफ करके उसमें खेती की जा सकती है। जब सरकार लापरवाही बरतती है, तो अन्नोत्पादन कम होता है। जैसा कि भगवद्गीता (१८.४४) में कहा गया है—

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्—वैश्यों के स्वभाव के अनुसार उनका उचित कार्य खेती करना तथा गौवों की रक्षा करना है। सरकार तथा क्षत्रियों का कर्तव्य है कि वे यह देखें कि तृतीय वर्ण के सदस्य वैश्य जो न तो ब्राह्मण हैं, न क्षत्रिय, ठीक से काम में लगें। क्षत्रिय मनुष्यों की रक्षा करने के निमित्त होते हैं, जबकि वैश्य उपयोगी पशुओं, विशेषतया गायों, की रक्षा करने के निमित्त हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥