श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 6

 
श्लोक
ताभ्यां निर्दह्यमानांस्तानुपलभ्य कुरूद्वह ।
राजोवाच महान् सोमो मन्युं प्रशमयन्निव ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
ताभ्याम्—वायु तथा अग्नि द्वारा; निर्दह्यमानान्—जलाये गये; तान्—उन (वृक्षों) को; उपलभ्य—देखकर; कुरूद्वह—हे महाराज परीक्षित; राजा—जंगलों के राजा; उवाच—कहा; महान्—महान्; सोम:—चन्द्रमा का अधिष्ठाता देव, सोमदेव ने; मन्युम्—क्रोध को; प्रशमयन्—शान्त करते हुए; इव—सदृश ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा परीक्षित! जब वृक्षों के राजा तथा चन्द्रमा के अधिष्ठाता देव सोम ने अग्नि तथा वायु को समस्त वृक्षों को जलाकर राख करते देखा तो उसे अपार दया आई, क्योंकि वह समस्त वनस्पतियों तथा वृक्षों का पालनकर्ता है। प्रचेताओं के क्रोध को शान्त करने के लिए सोम इस प्रकार बोला।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से पता चलता है कि चन्द्रमा का अधिष्ठाता देव (सोमदेव) ब्रह्माण्ड-भर के वृक्षों तथा पौधों का पालनकर्ता है। चाँदनी के कारण वृक्ष तथा पौधे तेजी से बढ़ते हैं। अतएव हम उन तथाकथित विज्ञानियों को किस प्रकार स्वीकार कर सकते हैं जिनकी चन्द्र-यात्राओं ने हमें जानकारी दी हैं
कि चन्द्रमा पर कोई वृक्ष या वनस्पति नहीं है? श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं—सोमो वृक्षाधिष्ठाता स एव वृक्षाणां राजा—चन्द्रमा का अधिष्ठाता देव सोम सारी वनस्पतियों का राजा है। हम यह कैसे विश्वास कर सकते हैं कि वनस्पति के पालनकर्ता के ही लोक में वनस्पति नहीं है?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥