श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 7

 
श्लोक
न द्रुमेभ्यो महाभागा दीनेभ्यो द्रोग्धुमर्हथ ।
विवर्धयिषवो यूयं प्रजानां पतय: स्मृता: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; द्रुमेभ्य:—वृक्षों को; महा-भागा:—हे परम भाग्यशाली; दीनेभ्य:—अत्यन्त गरीबों; द्रोग्धुम्—जलाकर भस्म करने के लिए; अर्हथ—तुम्हें चाहिए; विवर्धयिषव:—वृद्धि लाने के लिए इच्छुक; यूयम्—तुम सब; प्रजानाम्—सारे जीवों का, जिन्होंने तुम्हारी शरण ले रखी है; पतय:—स्वामी या रक्षक; स्मृता:—के रूप में ज्ञात ।.
 
अनुवाद
 
 हे भाग्यवान् महाशयों! तुम लोगों को चाहिए कि इन बेचारे वृक्षों को जलाकर भस्म न करो। तुम लोगों का कर्तव्य नागरिकों (प्रजा) के लिए समस्त समृद्धि की कामना करना तथा उनके रक्षकों के रूप में कार्य करना है।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह संकेत हुआ है कि सरकार या राजा का कर्तव्य है कि वह न केवल मनुष्य की रक्षा करे, अपितु अन्य सारे जीवों
की भी रक्षा करे जिनमें पशु वृक्ष तथा वनस्पतियाँ सभी सम्मिलित हैं। किसी भी जीव को व्यर्थ में मारा न जाये।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥