श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 4: प्रजापति दक्ष द्वारा भगवान् से की गई हंसगुह्य प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 8

 
श्लोक
अहो प्रजापतिपतिर्भगवान् हरिरव्यय: ।
वनस्पतीनोषधीश्च ससर्जोर्जमिषं विभु: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
अहो—हाय; प्रजापति-पति:—जीवों के स्वामियों का स्वामी; भगवान् हरि:—भगवान् हरि; अव्यय:—अविनाशी; वनस्पतीन्—वृक्षों को; ओषधी:—जड़ी बूटियों को; च—तथा; ससर्ज—उत्पन्न किया; ऊर्जम्—स्फूर्तिदायी; इषम्— भोजन; विभु:—परम पुरुष ने ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् श्री हरि सारे जीवों के स्वामी हैं जिनमें ब्रह्मा जैसे सारे प्रजापति सम्मिलित हैं। चूँकि वे सर्वव्यापक तथा अविनाशी प्रभु हैं, अत: उन्होंने अन्य जीवों के लिए खाद्य वस्तुओं के रूप में इन सारे वृक्षों तथा शाकों को उत्पन्न किया है।
 
तात्पर्य
 चन्द्रमा के अधिष्ठाता देव सोम ने प्रचेताओं को स्मरण दिलाया कि प्रजापतियों के भी पति भगवान् ने इस वनस्पति को हर एक को भोजन प्रदान करने के लिए उत्पन्न किया
है। यदि प्रचेतागण इन्हें नष्ट कर डालने का प्रयत्न करेंगे तो उनकी अपनी प्रजा भी कष्ट भोगेगी, क्योंकि भोजन के लिए वृक्षों की भी आवश्यकता पड़ती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥