श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 15

 
श्लोक
तत्सङ्गभ्रंशितैश्वर्यं संसरन्तं कुभार्यवत् ।
तद्गतीरबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्-सङ्ग—बुद्धिरूपी वेश्या की संगति से; भ्रंशित—हरी गई; ऐश्वर्यम्—स्वतंत्रता का ऐश्वर्य; संसरन्तम्—भौतिक जीवन शैली बिताते हुए; कु-भार्य-वत्—उस व्यक्ति की तरह जिसकी पत्नी दूषित है; तत्-गती:—दूषित बुद्धि की हरकतें; अबुधस्य—न जानने वाले की; इह—इस जगत में; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्—क्षणिक सकाम कर्मों के करने से क्या लाभ हो सकता है? ।.
 
अनुवाद
 
 [नारद मुनि ने एक ऐसे मनुष्य की भी बात कही थी जो वेश्या का पति है। हर्यश्वों ने इसे इस प्रकार समझा] यदि कोई पुरुष किसी वेश्या का पति बनता है, तो वह अपनी सारी स्वतंत्रता खो देता है। इसी तरह यदि जीव की बुद्धि दूषित है, तो वह अपने भौतिकतावादी जीवन को बढ़ा लेता है। भौतिक प्रकृति से निराश होकर उसे बुद्धि की गतियों का अनुसरण करना पड़ता है, जो सुख तथा दुख की विविध स्थितियों को लाती हैं। यदि कोई ऐसी स्थितियों में सकाम कर्म करता है, तो इससे क्या लाभ होगा?
 
तात्पर्य
 दूषित बुद्धि की उपमा वेश्या से दी गई है। जिसने अपनी बुद्धि को शुद्ध नहीं बनाया है, वह उस वेश्या के द्वारा नियंत्रित कहा जाता है। जैसा कि भगवद्गीता (२.४१) में कहा गया है—व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन—जो लोग वास्तव में गम्भीर हैं, वे एक प्रकार की बुद्धि द्वारा चालित होते हैं और वह है कृष्णभावनामृत की बुद्धि। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्—जो उचित बुद्धि में स्थिर नहीं है, वह जीवन के अनेक गुणों की खोज कर लेता है। इस तरह भौतिक कार्यों में लगा होने से वह प्रकृति के विभिन्न गुणों के सम्पर्क में आता है और तरह-तरह के तथाकथित सुख तथा दुख पाता है। यदि कोई पुरुष किसी वेश्या का पति बनता है, तो वह सुखी नहीं हो सकता। इसी तरह जो व्यक्ति भौतिक बुद्धि तथा भौतिक चेतना के आदेशों का पालन करता है, वह कभी भी सुखी नहीं होगा।
मनुष्य को सही ढंग से प्रकृति के कार्यों को समझना चाहिए। जैसा कि भगवद्गीता (३.२७) में कहा गया है—

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥

“जीवात्मा भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कार्यों का कर्त्ता मान बैठता है, जबकि वास्तव में वे प्रकृति के तीनों गुणों के द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।” यद्यपि मनुष्य प्रकृति के आदेशों का पालन करता होता है, किन्तु वह प्रसन्नतापूर्वक अपने को प्रकृति का स्वामी या पति मानता है। उदाहरणार्थ, विज्ञानीजन जन्म- जन्मांतर भौतिक प्रकृति का स्वामी बनने का प्रयास करते हैं और उस परम पुरुष को समझने की परवाह नहीं करते जिनके निर्देशानुसार इस भौतिक जगत की सारी वस्तुएँ गतिशील हैं। भौतिक प्रकृति के स्वामी बनने के प्रयास में वे नकली देवताओं की तरह हैं, जो जनता में यह घोषित करते हैं कि एक दिन वैज्ञानिक प्रगति ईश्वर के तथाकथित नियंत्रण को रोकने में समर्थ हो जायेगी। किन्तु वास्तव में जीव ईश्वर के विधानों को नियंत्रित करने में असमर्थ रहता है और वह दूषित बुद्धि रूपी वेश्या की संगति करने तथा विविध भौतिक शरीर स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जाता है। जैसा कि भगवद्गीता (१३.२२) में कहा गया है—

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।

कारणं गुणसंगोऽस्य सदसदयोनिजन्मसु ॥

“इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ प्रकृति का ही अनुसरण करता है। यह उस प्रकृति के साथ उसकी संगति के कारण है। इस तरह उसे विभिन्न योनियों में अच्छे तथा बुरे का सामना करता पड़ता है।” यदि कोई व्यक्ति क्षणिक सकाम कर्मों में पूरी तरह लगा रहता है और इस असली समस्या को हल नहीं करता तो उसे क्या लाभ मिलेगा?

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥