श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 16

 
श्लोक
सृष्ट्यप्ययकरीं मायां वेलाकूलान्तवेगिताम् ।
मत्तस्य तामविज्ञस्य किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
सृष्टि—सृष्टि; अप्यय—प्रलय; करीम्—करने वाली; मायाम्—मोहिनी शक्ति; वेला-कूल-अन्त—किनारे के निकट; वेगिताम्—अत्यन्त तेज होने से; मत्तस्य—उन्मत्त का; ताम्—उस भौतिक प्रकृति को; अविज्ञस्य—न जानने वाला; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्—क्षणिक सकाम कर्म करने से क्या लाभ हो सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 [नारद मुनि ने कहा था कि एक नदी है, जो दोनों दिशाओं में बहती है। हर्यश्वों ने इस कथन का तात्पर्य समझा] भौतिक प्रकृति दो प्रकार से कार्य करती है—सृजन द्वारा तथा संहार द्वारा। इस तरह भौतिक प्रकृति-रूपी नदी दोनों दिशाओं में बहती है। जो जीव अनजाने में इस नदी में गिर जाता है, वह इसकी लहरों में डूबता-उतराता जाता है और चूँकि नदी के किनारों के निकट धारा अधिक तेज रहती है, इसलिए वह बाहर निकल पाने में असमर्थ रहता है। माया-रूपी उस नदी में सकाम कर्म करने से क्या लाभ होगा?
 
तात्पर्य
 मनुष्य माया-रूपी नदी की लहरों में डूबता-उतराता रह सकता है, किन्तु वह ज्ञान तथा तपस्या के तटों पर आकर इन लहरों से बाहर भी निकल सकता है। किन्तु इन किनारों के निकट लहरें बड़ी प्रबल रहती हैं, अत: यदि वह यह नहीं समझता है कि वह लहरों द्वारा कैसे इधर उधर फैंका जा रहा है और वह क्षणिक सकाम कर्मों में लगा रहे तो उसे क्या लाभ मिलेगा? ब्रह्म-संहिता (५.४४) में एक कथन है—
सृष्टि स्थिति प्रलयसाधनशक्तिरेका छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा।

माया शक्ति, दुर्गा, सृष्टि-स्थिति-प्रलय का कार्यभार सँभालती है और वह भगवान् के निर्देशन में कार्य करती है (मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्)। जब मनुष्य अविद्या की नदी में गिर जाता है, तो वह लहरों द्वारा इधर-उधर उछाला जाता है, किन्तु वही माया उसे बचा भी सकती है, यदि वह कृष्ण की शरण में जाता है या कृष्णभावनाभावित बन जाता है। कृष्णभावनामृत ज्ञान तथा तपस्या है। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति वैदिक वाङ्मय से ज्ञान ग्रहण करता है, किन्तु साथ ही साथ उसे तपस्या करनी चाहिए।

भौतिक जीवन से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को कृष्णभावनामृत ग्रहण करना चाहिए। अन्यथा, यदि वह तथाकथित विज्ञान की प्रगति में बुरी तरह लगा रहेगा तो उसे कौन सा लाभ प्राप्त होगा? यदि वह प्रकृति की लहरों द्वारा बहा ले जाया जाता है, तो महान् विज्ञानी या दार्शनिक होने का क्या अर्थ? संसारी विज्ञान तथा दर्शन भी भौतिक सृष्टियाँ हैं। मनुष्य को समझना चाहिए कि माया किस तरह कार्य करती है और मनुष्य किस तरह अविद्या-रूपी नदी की उफनती लहरों से छुड़ाया जा सकता है। यह उसका प्रथम कर्तव्य है।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥