श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 18

 
श्लोक
ऐश्वरं शास्त्रमुत्सृज्य बन्धमोक्षानुदर्शनम् ।
विविक्तपदमज्ञाय किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
ऐश्वरम्—ईश्वर का ज्ञान या कृष्णभावनामृत लाना; शास्त्रम्—वैदिक साहित्य; उत्सृज्य—त्यागकर; बन्ध—बन्धन का; मोक्ष—तथा मोक्ष का; अनुदर्शनम्—विधियों की जानकारी देना; विविक्त-पदम्—आत्मा को पदार्थ से पृथक् करना; अज्ञाय—न जानते हुए; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्—क्षणभंगुर सकाम कर्मों का क्या लाभ हो सकता है ।.
 
अनुवाद
 
 [नारद मुनि ने हंस की बात की थी। इस श्लोक में हंस की व्याख्या की गई है]। वैदिक ग्रन्थ (शास्त्र) भलीभाँति यह बताते हैं, कि समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक शक्ति के स्रोत भगवान् को किस तरह समझना चाहिए। दरअसल, वे इन दोनों शक्तियों की विस्तार से व्याख्या करते हैं। हंस वह है, जो पदार्थ तथा आत्मा में अन्तर करता है, जो हर वस्तु के सार को ग्रहण करता है और जो बन्धन के तथा मोक्ष के उपायों की व्याख्या करता है। शास्त्रों के शब्द विविध प्रकार की ध्वनियों के रूप में हैं। यदि कोई मूर्ख धूर्त व्यक्ति नश्वर कार्यों में लगने के लिए इन शास्त्रों के अध्ययन को ताक पर रख देता है, तो फिर परिणाम क्या होगा?
 
तात्पर्य
 कृष्णभावनामृत आन्दोलन वैदिक साहित्य को आधुनिक भाषाओं में, विशेषतया अंग्रेजी, फ्रांसीसी तथा जर्मन जैसी पाश्चात्य भाषाओं में, प्रस्तुत करने के लिए अति उत्सुक है। पाश्चात्य जगत के कर्णधार, अमरीकी तथा यूरोपियन, आधुनिक सभ्यता की प्रतिमाएँ बन चुके हैं, क्योंकि भौतिक सभ्यता की प्रगति के लिए पाश्चात्य लोग अस्थायी कार्यों में अत्यन्त कुशल हैं। किन्तु विवेकवान् व्यक्ति यह देख सकता है कि सारे भव्य कार्य, यद्यपि नश्वर जीवन के लिए कदाचित् अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु शाश्वत जीवन से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं रहता। सारा जगत पश्चिम की भौतिकतावादी सभ्यता की नकल कर रहा है, अतएव कृष्णभावनामृत आन्दोलन मूल संस्कृत वैदिक ग्रन्थों का पाश्चात्य भाषाओं में अनुवाद करके पाश्चात्य लोगों को ज्ञान प्रदान करने में अत्यधिक रुचि रखता है।
विविक्त-पदम् शब्द द्योतक है जीवन के लक्ष्य से सम्बन्धित तार्किक प्रवचनों के मार्ग का। यदि जीवन में जो महत्त्वपूर्ण है, उसकी विवेचना नहीं की जाती तो मनुष्य अंधकार में जा गिरता है और जीवन के लिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। तो फिर ज्ञान में प्रगति करने से उसे क्या लाभ? पश्चिम के लोग अपने छात्रों को हिप्पी बनते देख रहे हैं, यद्यपि विश्वविद्यालयीन् शिक्षा के लिए वहाँ भव्य प्रबन्ध हैं। किन्तु कृष्णभावनामृत आन्दोलन इन गुमराह, नशीली दवाओं के अभ्यस्त छात्रों को कृष्ण की सेवा में लगाकर उन्हें मानव समाज के लिए कल्याण के कार्यों की ओर मोडऩे का प्रयास कर रहा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥