श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 19

 
श्लोक
कालचक्रं भ्रमि तीक्ष्णं सर्वं निष्कर्षयज्जगत् ।
स्वतन्त्रमबुधस्येह किमसत्कर्मभिर्भवेत् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
काल-चक्रम्—नित्यकाल का चक्र; भ्रमि—स्वत: घूमता हुआ; तीक्ष्णम्—अत्यन्त तेज; सर्वम्—समस्त; निष्कर्षयत्— हाँकते हुए; जगत्—संसार; स्व-तन्त्रम्—स्वतंत्र तथाकथित विज्ञानियों तथा दार्शनिकों की परवाह न करते हुए; अबुधस्य—(काल के नियम को) न जानने वाले का; इह—इस भौतिक जगत में; किम् असत्-कर्मभि: भवेत्—क्षणिक सकाम कर्मों में लगने से क्या लाभ ।.
 
अनुवाद
 
 [नारद मुनि ने तेज छुरों तथा वज्रों से बनी एक भौतिक वस्तु की बात की थी। हर्यश्वों ने इस रूपक को इस प्रकार समझा] नित्य काल बहुत ही तीक्ष्णता से गति करता है, मानो छुरों तथा वज्रों से बना हुआ हो। यह काल अबाध रूप से तथा पूर्णतया स्वतंत्र होकर सारे जगत के कार्यों का संचालन करता है। यदि मनुष्य नित्य काल तत्त्व का अध्ययन करने का प्रयास नहीं करता तो वह क्षणिक भौतिक कार्यों को करने से क्या लाभ प्राप्त कर सकता है?
 
तात्पर्य
 यह श्लोक क्षौर-पव्यं स्वयं भ्रमि शब्दों की व्याख्या करता है, जो नित्य काल की कक्ष्या का विशेष रूप से द्योतन करने वाले हैं। कहा जाता है कि काल तथा लहरें किसी मनुष्य की प्रतीक्षा नहीं करते। महान् राजनीतिज्ञ चाणक्य पण्डित के नैतिक उपदेशों के अनुसार— आयुष: क्षण एकोऽपि न लभ्य स्वर्णकोटिभि:।
न चेन्निरर्थकं नीति: का च हानिस्ततोऽधिका ॥

करोड़ों डालर देकर भी जीवन का एक क्षण वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए मनुष्य को यह सोचना चाहिए कि यदि वह अपने जीवन का एक क्षण भी व्यर्थ में गँवा देता है, तो कितनी बड़ी क्षति होती है। जीवन के लक्ष्य को न समझते हुए पशु की तरह जीवन बिताते हुए मनुष्य मूर्खतावश यह सोचता है कि शाश्वतता नाम की कोई वस्तु नहीं है और उसका पचास, साठ या हद से हद सौ वर्षों का जीवन ही सब कुछ है। यह सबसे बड़ी मूर्खता है। काल शाश्वत है और इस भौतिक जगत में मनुष्य अपने शाश्वत जीवन की विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है। यहाँ पर काल की उपमा तेज छुरे से दी गई है। छुरा तो बाल मूंडने के लिए होता है, किन्तु यदि ठीक से नहीं चलाया जाता तो गजब ढा सकता है। मनुष्य को सलाह दी जाती है, कि अपनी आयु का दुरुपयोग करके विपत्ति न खड़ी करे। उसे अत्यन्त सावधान रहकर अपने जीवन की अवधि का उपयोग आध्यात्मिक साक्षात्कार या कृष्णभावनामृत के लिए करना चाहिए।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥