श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 24

 
श्लोक
स भूय: पाञ्चजन्यायामजेन परिसान्‍त्‍वित: ।
पुत्रानजनयद्दक्ष: सवलाश्वान्सहस्रिण: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—प्रजापति दक्ष:; भूय:—पुन:; पाञ्चजन्यायाम्—अपनी पत्नी अस्किनी या पाञ्चजनी के गर्भ से; अजेन—ब्रह्मा द्वारा; परिसान्त्वित:—सान्त्वना दिये जाने पर; पुत्रान्—पुत्रों को; अजनयत्—उत्पन्न किया; दक्ष:—प्रजापति दक्ष ने; सवलाश्वान्—सवलाश्वों के नामवाले; सहस्रिण:—एक हजार ।.
 
अनुवाद
 
 जब प्रजापति दक्ष अपने खोये हुए पुत्रों के लिए शोक कर रहे थे तो ब्रह्मा ने उपदेश देकर उन्हें सान्त्वना दी और उसके बाद दक्ष ने अपनी पत्नी पाञ्चजनी के गर्भ से एक हजार सन्तानें और उत्पन्न कीं। इस बार के उनके पुत्र सवलाश्व कहलाये।
 
तात्पर्य
 प्रजापति दक्ष का यह नाम इसलिए पड़ा था, क्योंकि वे सन्तानें उत्पन्न करने में दक्ष थे। (दक्ष का अर्थ है “पटु”)। पहले उन्होंने अपनी पत्नी के गर्भ से दस हजार सन्तानें उत्पन्न की और जब ये सन्तानें खो गईं—जब वे भगवद्धाम चली गईं तो उन्होंने सन्तानों की दूसरी टोली उत्पन्न की जो सवलाश्व कहलाई। प्रजापति दक्ष
सन्तानें उत्पन्न करने में अत्यन्त दक्ष हैं और नारदमुनि समस्त बद्धजीवों का उद्धार करके उन्हें भगवद्धाम वापस भेजने में दक्ष हैं। अतएव भौतिकतावादी दक्ष आध्यात्मिक दक्ष नारद मुनि से सहमत नहीं होते, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि नारद मुनि हरे कृष्ण मंत्र के कीर्तन करने का अपना कार्य त्याग देंगे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥