श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 31

 
श्लोक
भ्रातृणां प्रायणं भ्राता योऽनुतिष्ठति धर्मवित् ।
स पुण्यबन्धु: पुरुषो मरुद्भ‍ि: सह मोदते ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
भ्रातृणाम्—ज्येष्ठ भाइयों का; प्रायणम्—मार्ग; भ्राता—आज्ञाकारी भाई; य:—जो; अनुतिष्ठति—अनुगमन करता है; धर्म वित्—धार्मिक सिद्धान्तों का ज्ञाता; स:—वह; पुण्य-बन्धु:—अत्यधिक पवित्र; पुरुष:—पुरुष; मरुद्भि:—वायु के देवताओं के; सह—साथ; मोदते—जीवन का आनन्द भोगता हैं ।.
 
अनुवाद
 
 धर्म के नियमों से अवगत भाई अपने ज्येष्ठ भाइयों के पदचिन्हों का अनुगमन करता है। अत्यधिक बढ़े-चढ़े होने से ऐसा पवित्र भाई मरुत जैसे देवताओं की संगति करने तथा आनन्द भोगने का अवसर प्राप्त करता है, जो सभी प्रकार से अपने भाइयों के प्रति स्नेहिल है।
 
तात्पर्य
 विभिन्न भौतिक सम्बन्धों में अपने-अपने विश्वास के अनुसार लोग विभिन्न लोकों में भेजे जाते हैं। यहाँ पर यह कहा गया है कि जो अपने भाइयों का अति आज्ञाकारी होता है उसे उनके ही जैसे मार्ग का अनुसरण करना
चाहिए और मरुद्लोक पहुँचने का अवसर प्राप्त करना चाहिए। नारद मुनि ने प्रजापति दक्ष के पुत्रों की दूसरी टोली को उनके अपने बड़े भाइयों का अनुगमन करने तथा आध्यात्मिक जगत पहुँचने के लिए सलाह दी।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥