श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 4-5

 
श्लोक
तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशया: ।
धर्मे पारमहंस्ये च प्रोत्पन्नमतयोऽप्युत ॥ ४ ॥
तेपिरे तप एवोग्रं पित्रादेशेन यन्त्रिता: ।
प्रजाविवृद्धये यत्तान् देवर्षिस्तान् ददर्श ह ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—उस तीर्थस्थान का; उपस्पर्शनात्—उस जल में स्नान करने से या इसे छूने से; एव—केवल; विनिर्धूत—पूर्णतया धुल गये; मल-आशया:—जिनकी अशुद्ध इच्छाएँ; धर्मे—अभ्यासों को; पारमहंस्ये—सर्वोच्च संन्यासियों द्वारा सम्पन्न; च— भी; प्रोत्पन्न—अत्यधिक उन्मुख; मतय:—जिनके मन; अपि उत—यद्यपि; तेपिरे—उन्होंने किया; तप:—तपस्या; एव— निश्चय ही; उग्रम्—कठिन; पितृ-आदेशेन—अपने पिता के आदेश से; यन्त्रिता:—लगाये गये; प्रजा-विवृद्धये—जनसंख्या बढ़ाने के उद्देश्य से; यत्तान्—तैयार; देवर्षि:—नारद ऋषि; तान्—उनको; ददर्श—देखा; ह—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 उस तीर्थस्थान में हर्यश्वगण नियमित रूप से नदी का जल स्पर्श करने और उसमें स्नान करने लगे। धीरे धीरे अत्यधिक शुद्ध हो जाने पर वे परमहंसों के कार्यों के प्रति उन्मुख हो गये। फिर भी चूँकि उनके पिता ने उन्हें जनसंख्या बढ़ाने का आदेश दिया था, अत: पिता की इच्छापूर्ति के लिए उन्होंने कठिन तपस्या की। एक दिन जब महर्षि नारद ने इन बालकों को जनसंख्या बढ़ाने के लिए ऐसी उत्तम तपस्या करते देखा तो वे उनके निकट आये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥