श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 5: प्रजापति दक्ष द्वारा नारद मुनि को शाप  »  श्लोक 9

 
श्लोक
कथं स्वपितुरादेशमविद्वांसो विपश्चित: ।
अनुरूपमविज्ञाय अहो सर्गं करिष्यथ ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
कथम्—किस तरह; स्व-पितु:—अपने पिता का; आदेशम्—आदेश; अविद्वांस:—अज्ञान; विपश्चित:—प्रत्येक बात जानने वाला; अनुरूपम्—तुम्हारे अनुरूप; अविज्ञाय—बिना जाने; अहो—हाय; सर्गम्—सृष्टि; करिष्यथ—तुम करोगे ।.
 
अनुवाद
 
 हाय! तुम्हारा पिता तो सर्वज्ञ है, किन्तु तुम उनके असली आदेश को नहीं जानते। अपने पिता के असली उद्देश्य को जाने बिना तुम किस तरह सन्तान उत्पन्न करोगे?
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥