श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 2

 
श्लोक
दश धर्माय कायादाद्द्विषट्त्रिणव चेन्दवे ।
भूताङ्गिर:कृशाश्वेभ्यो द्वे द्वे तार्क्ष्याय चापरा: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
दश—दस; धर्माय—राजा धर्म अर्थात् यमराज को; काय—कश्यप को; अदात्—दे दिया; द्वि-षट्—छह की दूनी तथा एक (तेरह); त्रि-नव—नौ का तिगुना (सत्ताईस); च—भी; इन्दवे—चन्द्रदेव को; भूत-अङ्गिर:-कृशाश्वेभ्य:—भूत, अंगिरा तथा कृशाश्व को; द्वे द्वे—दो दो; तार्क्ष्याय—पुन: कश्यप को; च—तथा; अपरा:—शेष ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने धर्मराज (यमराज) को दस, कश्यप को तेरह, चन्द्रमा को सत्ताईस तथा अंगिरा, कृशाश्व एवं भूत को दो-दो कन्याएँ दान स्वरूप दे दीं। शेष चार कन्याएँ कश्यप को दे दी गईं (इस प्रकार कश्यप को कुल सत्रह कन्याएँ प्राप्त हुईं)।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥