श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 29-31

 
श्लोक
अरिष्टायास्तु गन्धर्वा: काष्ठाया द्विशफेतरा: ।
सुता दनोरेकषष्टिस्तेषां प्राधानिकाञ् श‍ृणु ॥ २९ ॥
द्विमूर्धा शम्बरोऽरिष्टो हयग्रीवो विभावसु: ।
अयोमुख: शङ्कुशिरा: स्वर्भानु: कपिलोऽरुण: ॥ ३० ॥
पुलोमा वृषपर्वा च एकचक्रोऽनुतापन: ।
धूम्रकेशो विरूपाक्षो विप्रचित्तिश्च दुर्जय: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
अरिष्टाया:—अरिष्टा के गर्भ से; तु—लेकिन; गन्धर्वा:—सारे गन्धर्व; काष्ठाया:—काष्ठा से; द्वि-शफ-इतरा:—दो खुरों वाले पशुओं से इतर पशु यथा घोड़े इत्यादि, जिनके खुर विभाजित नहीं हैं; सुता:—पुत्र; दनो:—दनु के गर्भ से; एक- षष्टि:—इकसठ; तेषाम्—उनके; प्राधानिकान्—प्रमुख प्रमुख; शृणु—सुनो; द्विमूर्धा—द्विमूर्धा; शम्बर:—शम्बर; अरिष्ट:—अरिष्ट; हयग्रीव:—हयग्रीव; विभावसु:—विभावसु; अयोमुख:—अयोमुख; शङ्कुशिरा:—शंकुशिरा; स्वर्भानु:—स्वर्भानु; कपिल:—कपिल; अरुण:—अरुण; पुलोमा—पुलोमा; वृषपर्वा—वृषपर्वा; च—भी; एकचक्र:— एकचक्र; अनुतापन:—अनुतापन; धूम्रकेश:—धूम्रकेश; विरूपाक्ष:—विरूपाक्ष; विप्रचित्ति:—विप्रचित्ति; च—तथा; दुर्जय:—दुर्जय ।.
 
अनुवाद
 
 अरिष्टा के गर्भ गन्धर्व उत्पन्न हुए और काष्ठा से घोड़े इत्यादि एक खुर वाले पशु। हे राजन्! दनु के इकसठ पुत्र उत्पन्न हुए जिनमें से अठारह प्रमुख हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं— द्विमूर्धा, शम्बर, अरिष्ट, हयग्रीव, विभावसु, अयोमुख, शंकुशिरा, स्वर्भानु, कपिल, अरुण, पुलोमा, वृषपर्वा, एकचक्र, अनुतापन, धूम्रकेश, विरूपाक्ष, विप्रचित्ति तथा दुर्जय।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥