श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 3

 
श्लोक
नामधेयान्यमूषां त्वं सापत्यानां च मे श‍ृणु ।
यासां प्रसूतिप्रसवैर्लोका आपूरितास्त्रय: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
नामधेयानि—विभिन्न नाम; अमूषाम्—उनको; त्वम्—तुम; स-अपत्यानाम्—अपनी संतानों सहित; च—तथा; मे—मुझसे; शृणु—कृपया सुनिये; यासाम्—उन सबों के; प्रसूति-प्रसवै:—अनेक सन्तानों तथा वंशजों के द्वारा; लोका:—समस्त लोक; आपूरिता:—बसे हुए हैं; त्रय:—तीन (ऊपरी, बीच के तथा निम्न लोक) ।.
 
अनुवाद
 
 अब मुझसे इन समस्त कन्याओं तथा उनके वंशजों के नाम सुनो, जिनसे ये तीनों लोक पूरित हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥