श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 33-36

 
श्लोक
वैश्वानरसुता याश्च चतस्रश्चारुदर्शना: ।
उपदानवी हयशिरा पुलोमा कालका तथा ॥ ३३ ॥
उपदानवीं हिरण्याक्ष: क्रतुर्हयशिरां नृप ।
पुलोमां कालकां च द्वे वैश्वानरसुते तु क: ॥ ३४ ॥
उपयेमेऽथ भगवान् कश्यपो ब्रह्मचोदित: ।
पौलोमा: कालकेयाश्च दानवा युद्धशालिन: ॥ ३५ ॥
तयो: षष्टिसहस्राणि यज्ञघ्नांस्ते पितु: पिता ।
जघान स्वर्गतो राजन्नेक इन्द्रप्रियङ्कर: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
वैश्वानर-सुता:—वैश्वानर की पुत्रियाँ; या:—जो; च—तथा; चतस्र:—चार; चारु-दर्शना:—अत्यन्त सुन्दरी; उपदानवी— उपदानवी; हयशिरा—हयशिरा; पुलोमा—पुलोमा; कालका—कालका; तथा—और; उपदानवीम्—उपदानवीसे; हिरण्याक्ष:—असुर हिरण्याक्षने; क्रतु:—क्रतु ने; हयशिराम्—हयशिरा ने; नृप—हे राजन्; पुलोमाम् कालकाम् च— पुलोमा तथा कालका ने; द्वे—दोनों; वैश्वानर-सुते—वैश्वानर की कन्याएँ; तु—लेकिन; क:—प्रजापति ने; उपयेमे—ब्याह किया; अथ—तब; भगवान्—परम शक्तिमान; कश्यप:—कश्यप मुनि; ब्रह्म-चोदित:—ब्रह्मा के अनुनय-विनय से; पौलोमा: कालकेया: च—पौलोम तथा कालकेय नामक; दानवा:—दानव; युद्ध-शालिन:—युद्धप्रिय, योद्धा; तयो:— उनमें से; षष्टि-सहस्राणि—साठ हजार; यज्ञ-घ्नान्—यज्ञ को विध्वंस करने वाले; ते—तुम्हारे; पितु:—पिता का; पिता— पिता; जघान—मार डाला; स्व:-गत:—स्वर्गलोक में; राजन्—हे राजन्; एक:—अकेले; इन्द्र-प्रियम्-कर:—राजा इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 दनु के पुत्र वैश्वानर के चार सुन्दर कन्याएँ थीं जिनके नाम थे—उपदानवी, हयशिरा, पुलोमा तथा कालका। इनमें से उपदानवी के साथ हिरण्याक्ष का तथा हयशिरा के साथ क्रतु का विवाह हुआ। तत्पश्चात् श्रीब्रह्मा के अनुनय-विनय पर प्रजापति कश्यप ने वैश्वानर की अन्य दो कन्याओं, पुलोमा तथा कालका के साथ विवाह कर लिया। कश्यप की इन दोनों पत्नियों के गर्भ से साठ हजार पुत्र हुए जो पौलोम तथा कालकेय के नाम से विख्यात हुए, जिनमें से निवातकवच प्रमुख था। वे सब अत्यन्त वीर तथा युद्ध कुशल थे और उनका लक्ष्य मुनियों के द्वारा सम्पन्न यज्ञों में विध्न डालना था। हे राजन्! जब तुम्हारे पितामह अर्जुन स्वर्ग लोक गये तो उन्होंने अकेले ही इन असुरों का वध किया था जिससे राजा इन्द्र उनका परम प्रिय बन गया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥