श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 37

 
श्लोक
विप्रचित्ति: सिंहिकायां शतं चैकमजीजनत् ।
राहुज्येष्ठं केतुशतं ग्रहत्वं य उपागता: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
विप्रचित्ति:—विप्रचित्तिने; सिंहिकायाम्—अपनी पत्नी सिंहिका के गर्भ से; शतम्—एक सौ; च—तथा; एकम्—एक; अजीजनत्—जन्म दिया; राहु-ज्येष्ठम्—जिनमें से राहु सबसे बड़ा है; केतु-शतम्—एक सौ केतु; ग्रहत्वम्—ग्रह होने का; ये—सबके सब; उपागता:—प्राप्त किया ।.
 
अनुवाद
 
 विप्रचित्ति को अपनी पत्नी सिंहिका से एक सौ एक पुत्र प्राप्त हुए जिनमें राहु सबसे ज्येष्ठ था और अन्य एक सौ केतु थे। इन सबों को प्रभावशाली ग्रहों (लोकों) में स्थान प्राप्त हुआ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥