श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 38-39

 
श्लोक
अथात: श्रूयतां वंशो योऽदितेरनुपूर्वश: ।
यत्र नारायणो देव: स्वांशेनावातरद्विभु: ॥ ३८ ॥
विवस्वानर्यमा पूषा त्वष्टाथ सविता भग: ।
धाता विधाता वरुणो मित्र: शत्रु उरुक्रम: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तत्पश्चात्; अत:—अब; श्रूयताम्—सुनो; वंश:—वंश; य:—जो; अदिते:—अदिति से; अनुपूर्वश:—तिथिवार क्रम में; यत्र—जिसमें; नारायण:—भगवान्; देव:—ईश्वर; स्व-अंशेन—अपने अंश से; अवातरत्—अवतार लिया; विभु:— परमेश्वर; विवस्वान्—विवस्वान्; अर्यमा—अर्यमा; पूषा—पूषा; त्वष्टा—त्वष्टा; अथ—तत्पश्चात्; सविता—सविता; भग:—भग; धाता—धाता; विधाता—विधाता; वरुण:—वरुण; मित्र:—मित्र; शत्रु:—शत्रु; उरुक्रम:—उरुक्रम ।.
 
अनुवाद
 
 अब सुनो, मैं अदिति की वंश-परम्परा का तिथि-क्रमानुसार वर्णन कर रहा हूँ। इस वंश में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण ने स्वांश रूप में अवतार लिया। अदिति के पुत्रों के नाम इस प्रकार हैं—विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, शत्रु तथा उरुक्रम।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥