श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 40

 
श्लोक
विवस्वत: श्राद्धदेवं संज्ञासूयत वै मनुम् ।
मिथुनं च महाभागा यमं देवं यमीं तथा ।
सैव भूत्वाथ वडवा नासत्यौ सुषुवे भुवि ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
विवस्वत:—सूर्यदेव की; श्राद्धदेवम्—श्राद्धदेव नामक; संज्ञा—संज्ञा ने; असूयत—जन्म दिया; वै—निस्सन्देह; मनुम्— मनु को; मिथुनम्—युगल; च—तथा; महा-भागा—परमभाग्यवती संज्ञा; यमम्—यमराज को; देवम्—देवता; यमीम्— उनकी बहन यमी को; तथा—और; सा—वह; एव—भी; भूत्वा—होकर; अथ—तब; वडवा—घोड़ी; नासत्यौ—अश्विनी कुमारों को; सुषुवे—जन्म दिया; भुवि—पृथ्वी पर ।.
 
अनुवाद
 
 सूर्यदेव विवस्वान् की भाग्यवती पत्नी संज्ञा से श्राद्धदेव मनु तथा यमराज और यमुना नदी (यमी) का जोड़ा उत्पन्न हुआ। तब यमी ने घोड़ी का रूप धारण करके इस पृथ्वी पर विचरण करते हुए अश्विनी कुमारों को जन्म दिया।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥