श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 6: दक्ष की कन्याओं का वंश  »  श्लोक 43

 
श्लोक
पूषानपत्य: पिष्टादो भग्नदन्तोऽभवत्पुरा ।
योऽसौ दक्षाय कुपितं जहास विवृतद्विज: ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
पूषा—पूषा; अनपत्य:—संतानरहित; पिष्ट-अद:—आटा खाकर निर्वाह करने वाला; भग्न-दन्त:—टूटे दाँतों वाला; अभवत्—हो गया; पुरा—प्राचीन काल में; य:—जो; असौ—वह; दक्षाय—दक्ष पर; कुपितम्—अत्यन्त क्रुद्ध; जहास— हँसा; विवृत-द्विज:—दाँत निकालकर ।.
 
अनुवाद
 
 पूषा के कोई सन्तान नहीं हुई। जब भगवान् शिव दक्ष पर क्रुद्ध हुए तो पूषा दाँत निकाल कर हँसा था। अत: उसके दाँत जाते रहे और तब से वह पिसा हुआ अन्न खाकर जीवन-निर्वाह करता रहा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥