श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 13

 
श्लोक
य: पारमेष्ठ्यं धिषणमधितिष्ठन्न कञ्चन ।
प्रत्युत्तिष्ठेदिति ब्रूयुर्धर्मं ते न परं विदु: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो भी; पारमेष्ठ्यम्—राजसी; धिषणम्—सिंहासन पर; अधितिष्ठन्—आसीन; न—नहीं; कञ्चन—कोई भी; प्रत्युत्तिष्ठेत्—पहले उठना चाहिए; इति—इस प्रकार; ब्रूयु:—जो ऐसा कहते हैं; धर्मम्—धर्मादेश; ते—वे; न—नहीं; परम्—अत्यधिक; विदु:—जानते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 यदि कोई यह कहे कि राजा के उच्च सिंहासन पर आसीन व्यक्ति को दूसरे राजा या ब्राह्मण के सत्कार हेतु उठकर खड़ा नहीं होना चाहिए, तो यही समझना चाहिए कि वह श्रेष्ठ धार्मिक नियमों को नहीं जानता।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग के सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर कहते हैं कि जब कोई राजा या राष्ट्रपति अपने सिंहासन पर आसीन हो तो सभा में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का सत्कार करना उसके लिए आवश्यक नहीं है, किन्तु उसे चाहिए कि अपने श्रेष्ठजनों, यथा गुरु, ब्राह्मण तथा वैष्णवों, का आदर करे। उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए इसके अनेक उदाहरण हैं। जब भगवान् श्रीकृष्ण सिंहासन पर आसीन थे और सौभाग्यवश नारद ने उनकी सभा में प्रवेश किया, तो वे नारद को नमस्कार करने के लिए अपने पार्षदों सहित उठकर खड़े हो गये। नारद को ज्ञात था कि श्रीकृष्ण भगवान् हैं और श्रीकृष्ण भी जानते थे कि नारद उनके भक्त हैं, किन्तु तो भी भगवान् श्रीकृष्ण ने धार्मिक शिष्टाचार का पालन किया। चूँकि नारद एक ब्रह्मचारी, ब्राह्मण तथा महान् भक्त थे, इसलिए राजा के पद पर होते हुए भी श्रीकृष्ण ने नारद को सादर नमस्कार किया। वैदिक सभ्यता में ऐसा आचरण देखा जाता है। जिस सभ्यता में लोग यह नहीं जानते कि नारद तथा कृष्ण के प्रतिनिधियों का किस प्रकार सत्कार
किया जाये, किस प्रकार समाज का निर्माण हो और किस प्रकार कृष्णभावनामृत में अग्रसर हुआ जाये, भले ही वह सभ्यता प्रौद्योगिकी की दृष्टि से जिसका सम्बन्ध नई कारें बनाने और नए गगनचुम्बी भवन निर्माण करने और बाद में उन्हें तोड़ कर और नए बनाने में कितनी ही समुन्नत क्यों न हो, वह मानव सभ्यता नहीं है। मानव-सभ्यता तभी प्रगति करती है जब उसके लोग चातुर्वर्ण्य प्रणाली का पालन करते हों। प्रथम श्रेणी के लोगों को सलाहकार के रूप में, द्वितीय श्रेणी के लोगों को प्रशासक के रूप में, तृतीय श्रेणी के लोगों को अन्नोत्पादन तथा गोरक्षा के लिए और चतुर्थ श्रेणी के लोगों को समाज की तीनों उच्च श्रेणियों की आज्ञा का पालन करना चाहिए। जो आदर्श समाज की इस प्रणाली को नहीं मानता उसे पंचम श्रेणी का माना जाना चाहिए। वैदिक नियमों तथा विधानों से विहीन समाज मानवता के लिए तनिक भी सहायक नहीं हो सकता। जैसाकि इस श्लोक में कहा गया है—धर्मं ते न परं विदु:—ऐसा समाज न तो जीवन के उद्देश्य से परिचित है और न श्रेष्ठ धार्मिक नियमों से।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥