श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 14

 
श्लोक
तेषां कुपथदेष्टृणां पततां तमसि ह्यध: ।
ये श्रद्दध्युर्वचस्ते वै मज्जन्त्यश्मप्लवा इव ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
तेषाम्—उन (बुरे नेताओं) का; कु-पथ-देष्टृणाम्—कुमार्ग दिखाने वाले; पतताम्—स्वयं गिरकर; तमसि—अंधकार में; हि—निस्सन्देह; अध:—नीचे; ये—जो कोई; श्रद्दध्यु:—श्रद्धा रखते हैं; वच:—शब्द; ते—वे; वै—निस्सन्देह; मज्जन्ति— डूब जाते हैं; अश्म-प्लवा:—पत्थर की नाव; इव—के समान ।.
 
अनुवाद
 
 जो नेता अज्ञानी हैं और लोगों को विनाश के कुमार्ग पर ले जाते हैं (जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया है) वे वास्तव में पत्थर की नाव पर सवार हैं और उनके पीछे अंधे होकर चलने वाले भी वैसे हैं। पत्थर की नाव पानी में नहीं तैर सकती। वह तो यात्रियों समेत पानी में डूब जायेगी। इसी प्रकार जो लोग मनुष्यों को कुमार्ग पर ले जाते हैं, वे अपने अनुयायियों समेत नरक को जाते हैं।
 
तात्पर्य
 वैदिक ग्रन्थों (भागवत ११.२०.१७) में कहा गया है—
नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम् हम सभी बद्धजीव अज्ञान के सागर में गिरे हुए हैं, किन्तु सौभाग्यवश हमारा मनुष्य-शरीर सागर को पार करने का सुअवसर प्रदान करता है, क्योंकि यह एक सुन्दर नाव के समान है। जब गुरु-रूपी कप्तान इस नाव का निर्देशन करता है, तो यह सरलतापूर्वक सागर को पार कर लेती है। यही नहीं, वैदिक उपदेश रूपी अनुकूल हवाओं के द्वारा नाव को पार करने में सहायता मिलती है। यदि कोई इस अज्ञानसागर को पार करने की समस्त सुविधाओं का लाभ नहीं उठाता तो वह निश्चय ही आत्मघात करता है।

जो पत्थर की बनी नाव में सवार होता है, समझो वह डूब गया। सिद्धावस्था प्राप्त करने के लिए मानवता को सबसे पहले उन छद्म-नेताओं का परित्याग करना होगा जो पत्थर की नाव सामने लाते हैं। समस्त मानव समाज ऐसी भयावह स्थिति में है कि इसे बचाने के लिए वेदों के आदर्श उपदेशों का पालन आवश्यक है। ऐसे उपदेशों का सार भगवद्गीता के रूप में उपलब्ध है। मनुष्य को चाहिए कि वे अन्य उपदेशों को ग्रहण न करके गीता के ही उपदेशों का अनुसरण करे, क्योंकि उसमें जीव का उद्देश्य सुस्पष्ट मिलता है। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं—सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज—“अन्य समस्त धर्मों को छोडक़र एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो।” भले ही कोई श्रीकृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् न माने, किन्तु उनके उपदेश इतने उच्च तथा मानवता के लिए इतने उपयोगी हैं कि उनके पालन करने से मनुष्य बच सकता है। अन्यथा वह योग की व्यायाम सम्बन्धी विधियों तथा अनधिकारिक चिन्तन (ध्यान) के द्वारा ठगा जाता रहेगा। इस प्रकार वह पत्थर की नाव में सवार होता रहेगा जो समस्त यात्रियों सहित डूबती रहेगी। दुर्भाग्यवश, अमरीकी लोग भौतिक अव्यवस्था से उबरने के लिए उत्सुक तो दिखते हैं, किन्तु कभी-कभी वे पत्थर की नाव बनाने वालों का समर्थन करने लगते हैं। इससे उनको लाभ नहीं होने वाला। उन्हें चाहिए कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन के रूप में श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त उचित नाव को ग्रहण करें। तब वे सरलता से बच सकेंगे। इस सम्बन्ध में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की टीका है—अश्ममय: प्लवो येषां ते यथा मज्जन्तं प्लवम् अनुमज्जन्ति तथेति राजनित्युपदेष्ट्रिषु स्वसभ्येषु कोपो व्यंजित:। यदि यह समाज राजनीति के द्वारा निर्देशित होता रहेगा और एक राष्ट्र दूसरे के ऊपर हावी होता रहेगा तो यह अवश्य ही पत्थर की नाव के समान डूब जायेगा। इससे मानव समाज का उद्धार नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य समझने, ईश्वर को जानने तथा मानव उद्देश्य को पूरा करने के लिए मनुष्यों को कृष्णभावनामृत की शरण लेनी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥