श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 29-30

 
श्लोक
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्ति: पिता मूर्ति: प्रजापते: ।
भ्राता मरुत्पतेर्मूर्तिर्माता साक्षात् क्षितेस्तनु: ॥ २९ ॥
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथि: स्वयम् ।
अग्नेरभ्यागतो मूर्ति: सर्वभूतानि चात्मन: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
आचार्य:—अपने आचरण द्वारा वैदिक ज्ञान प्रदान करने वाला शिक्षक या गुरु; ब्रह्मण:—समस्त वेदों की; मूर्ति:— साक्षात्; पिता—पिता; मूर्ति:—साक्षात्; प्रजापते:—श्रीब्रह्मा की; भ्राता—भाई; मरुत्-पते: मूर्ति:—साक्षात् इन्द्र; माता— माता; साक्षात्—साक्षात्; क्षिते:—पृथ्वी का; तनु:—शरीर; दयाया:—कृपा की; भगिनी—बहन; मूर्ति:—साक्षात्; धर्मस्य—धर्म का; आत्म—स्वयं; अतिथि:—अतिथि; स्वयम्—स्वयं; अग्ने:—अग्निदेव का; अभ्यागत:—आमंत्रित मेहमान; मूर्ति:—साक्षात्; सर्व-भूतानि—समस्त जीव; च—तथा; आत्मन:—परमेश्वर विष्णु का ।.
 
अनुवाद
 
 आचार्य अर्थात् गुरु, जो समस्त वैदिक ज्ञान की शिक्षा देता है और यज्ञोपवीत प्रदान करके दीक्षित करता है साक्षात् वेद है। इसी प्रकार पिता ब्रह्मा का रूप, भाई राजा इन्द्र का, माता पृथ्वीलोक तथा बहन कृपा की, अतिथि धर्म का, आमंत्रित मेहमान अग्निदेव का और समस्त जीव भगवान् विष्णु का साक्षात् रूप होते हैं।
 
तात्पर्य
 चाणक्य पंडित की नीति आत्मवत् सर्वभूतेषु के अनुसार सभी जीवों को अपने समान देखना चाहिए। इसका अर्थ यह हुआ है कि किसी को तुच्छ मानकर उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। चूँकि परमात्मा प्रत्येक
जीव के शरीर में स्थित हैं, अत: जीव का भगवान् के मन्दिर के तुल्य आदर होना चाहिए। इस श्लोक में बताया गया है कि गुरु, पिता, भाई, बहन, अतिथि इत्यादि का किस प्रकार सम्मान किया जाना चाहिए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥