श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 33

 
श्लोक
न गर्हयन्ति ह्यर्थेषु यविष्ठाङ्‌घ्य्रभिवादनम् ।
छन्दोभ्योऽन्यत्र न ब्रह्मन् वयो ज्यैष्ठ्यस्य कारणम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; गर्हयन्ति—मना करते हैं; हि—निस्सन्देह; अर्थेषु—स्वार्थ के लिए; यविष्ठ-अङ्घ्रि—अपने से छोटे के चरणकमलों पर; अभिवादनम्—नमस्कार; छन्दोभ्य:—वैदिक मंत्रों से; अन्यत्र—छोडक़र; न—नहीं; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; वय:—आयु; ज्यैष्ठ्यस्य—गुरुता का; कारणम्—कारण ।.
 
अनुवाद
 
 देवताओं ने आगे कहा हमसे छोटे होने के कारण अपनी आलोचना से मत डरो। ऐसा शिष्टाचार वैदिक मंत्रों पर लागू नहीं होता। वैदिक मंत्रों को छोडक़र, सर्वत्र गुरुता आयु से निर्धारित होती है, किन्तु यदि कोई वैदिक मंत्रों के उच्चारण में बढ़ाचढ़ा हो तो ऐसे कम आयु वाले व्यक्ति को भी नमस्कार किया जा सकता है। अत: तुम भले ही सम्बन्ध में हमसे छोटे हो, किन्तु तुम बिना किसी हिचक के हमारे पुरोहित हो सकते हो।
 
तात्पर्य
 कहा गया है वृद्धत्वं वयसा विना आयु में बड़ा न होकर भी मनुष्य वृद्ध (ज्येष्ठ) हो सकता है। यदि कोई ज्ञान में वरिष्ठ है, तो वृद्ध न होते हुए भी वह ज्येष्ठ हो जाता है। विश्वरूप देवताओं का भतीजा होने के कारण उनसे छोटा था, किन्तु वे उसे अपना पुरोहित बनाना चाहते थे, अत: उसे उनका नमस्कार स्वीकार करना पड़ेगा। देवताओं ने स्पष्ट किया कि इसमें उसे हिचकना नहीं चाहिए; वह उनका पुरोहित बन सकता है, क्योंकि वह वैदिक ज्ञान में आगे है। इसी प्रकार चाणक्य पंडित का भी उपदेश है नीचादप्युत्तमं ज्ञानम् मनुष्य समाज की नीची श्रेणी के व्यक्ति से भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। सर्वोच्च वर्ण के सदस्य होने से ब्राह्मण शिक्षक होते हैं, किन्तु यदि किसी निम्न परिवार का व्यक्ति, यथा क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के परिवार का व्यक्ति ज्ञानी है, तो उसे शिक्षक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय (श्रीचैतन्य- चरितामृत मध्य ८.१२८) के समक्ष अपने विचार व्यक्त करते हुए स्वीकार किया है कि किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय।
येइ कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता, सेइ ‘गुरु’ हय ॥

चाहे कोई ब्राह्मण हो या शूद्र अथवा गृहस्थ या संन्यासी इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। ये तो सभी भौतिक उपाधियाँ हैं। आत्मज्ञानी पुरुष के लिए ये उपाधियाँ व्यर्थ हैं। अत: यदि कोई कृष्णभावनामृत के विज्ञान में सिद्ध है, तो वह गुरु बन सकता है, चाहे मनुष्य-समाज में उसकी स्थिति कैसी भी क्यों न हो।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥