श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 7: इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान  »  श्लोक 40

 
श्लोक
यया गुप्त: सहस्राक्षो जिग्येऽसुरचमूर्विभु: ।
तां प्राह स महेन्द्राय विश्वरूप उदारधी: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
यया—जिससे; गुप्त:—सुरक्षित; सहस्र-अक्ष:—एक हजार नेत्रों वाले इन्द्र देवता ने; जिग्ये—जीता; असुर—असुरों की; चमू:—सैन्यशक्ति; विभु:—अत्यन्त शक्तिशाली होकर; ताम्—उससे; प्राह—बोला; स: महेन्द्राय—स्वर्ग के राजा महेन्द्र को; विश्वरूप:—विश्वरूप; उदार-धी:—अत्यन्त उदार चित्त वाला ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यन्त उदारचित्त वाले विश्वरूप ने राजा इन्द्र (सहस्राक्ष) को वह गुप्त स्तोत्र बता दिया जिससे इन्द्र की रक्षा हो सकी और असुरों की सैन्यशक्ति जीत ली गई।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध के अन्तर्गत “इन्द्र द्वारा गुरु बृहस्पति का अपमान” नामक सातवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥