श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 15

 
श्लोक
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्प:
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराह: ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद् भरताग्रजोऽस्मान् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
रक्षतु—ईश्वर रक्षा करें; असौ—वह; मा—मुझको; अध्वनि—मार्ग में; यज्ञ-कल्प:—जिनकी पुष्टि यज्ञों के द्वारा की जाती है, यज्ञमूर्ति; स्व-दंष्ट्रया—अपनी ही दाढ़ों से; उन्नीत—उठाया जाकर; धर:—पृथ्वी लोक; वराह:—भगवान् वराह; राम:— भगवान् राम; अद्रि-कूटेषु—पर्वतों की चोटियों पर; अथ—तब; विप्रवासे—विदेशों में; स-लक्ष्मण:—अपने भाई लक्ष्मण सहित; अव्यात्—रक्षा करें; भरत-अग्रज:—महाराज भरत के ज्येष्ठ भ्राता; अस्मान्—हमारी ।.
 
अनुवाद
 
 परम अविनाशी भगवान् को यज्ञों के द्वारा जाना जाता है, इसीलिए वे यज्ञेश्वर कहलाते हैं। भगवान् वराह के रूप में अवतार लेकर उन्होंने पृथ्वी लोक को ब्रह्माण्ड के गर्त से जल में से निकालकर अपनी नुकी दाढ़ों में धारण किया। ऐसे भगवान् मार्ग में दुष्टों से मेरी रक्षा करें। परशुराम मेरी पर्वत शिखरों पर रक्षा करें और भरत के अग्रज भगवान् रामचन्द्र अपने भाई लक्ष्मण सहित विदेशों में मेरी रक्षा करें।
 
तात्पर्य
 राम तीन हैं। परशुराम (जामदाग्न्य), दूसरे भगवान् रामचन्द्र तथा तीसरे श्रीबलराम। इस श्लोक में आगत रामोऽद्रिकूटेष्व
अथ में श्री परशुराम का संकेत है। महाराज भरत या लक्ष्मण के भाई भगवान् रामचन्द्र हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥