श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 19

 
श्लोक
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद्
बुद्धस्तु पाषण्डगणप्रमादात् ।
कल्कि: कले: कालमलात् प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतार: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
द्वैपायन:—वैदिक ज्ञान के दाता श्रील व्यासदेव; भगवान्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का सर्वशक्तिमान अवतार; अप्रबोधात्—शास्त्र के अज्ञान से; बुद्ध: तु—तथा भगवान् बुद्ध; पाषण्ड-गण—अबोध व्यक्तियों में मायाजाल फैलाने वाले नास्तिकों का; प्रमादात्—पागलपन से; कल्कि:—केशव के अवतार भगवान् कल्कि; कले:—इस कलियुग के; काल-मलात्—इस युग के अंधकार से; प्रपातु—रक्षा करें; धर्म-अवनाय—धर्म की रक्षा हेतु; उरु—महान्; कृत- अवतार:—जो अवतरित हुए ।.
 
अनुवाद
 
 वैदिक-ज्ञान से विहीन होने के कारण सभी प्रकार की अविद्या से श्रीभगवान् के अवतार व्यासदेव मेरी रक्षा करें। वेद विरुद्ध कर्मों से तथा आलस्य से, जिसके कारण प्रमादवश वेद ज्ञान तथा अनुष्ठान भूल जाते हैं, भगवान् बुद्धदेव मुझे बचाएँ। भगवान् कल्कि देव, जिनका अवतार धार्मिक नियमों की रक्षा के लिए हुआ, मुझे कलियुग की मलिनता से बचायें।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में श्रीभगवान् के विभिन्न अवतारों का उल्लेख हुआ है, जो विभिन्न कार्यों के लिए प्रकट होते हैं। महामुनि श्रील व्यासदेव ने समस्त मानव समाज के कल्याण के लिए वेदों की रचना की। यदि कोई इस कलिकाल में भी अविद्या की प्रतिक्रिया से बचना चाहता है, तो उसे चाहिए कि श्रील व्यासदेव की रचनाएँ पढ़े। इनके नाम हैं—चारों वेद (साम, यजुर, ऋग् तथा अथर्व), १०८ उपनिषदें, वेदान्त सूत्र (ब्रह्मसूत्र), महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुराण (ब्रह्मसूत्र पर व्यासदेव का भाष्य) तथा अन्य सत्रह पुराण। श्रील व्यासदेव की कृपा से ही हमारे पास दिव्य ज्ञान की इतनी कृतियाँ हैं जिनसे हम अपने को अविद्या के चंगुल से बचा सकते हैं।
जैसाकि श्रील जयदेव गोस्वामी ने अपने दशावतार स्तोत्र में बताया है, भगवान् बुद्ध ने वैदिक ज्ञान की निन्दा की।

निन्दसि यज्ञविधरेहह श्रतिजातं सदयहृदयदर्शितपशुघातम् केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥

भगवान् बुद्ध का उद्देश्य जनता को पशु-बध के कुकृत्य से बचाना और विरीह पशुओं का बध होने से बचाना था। जब पाखंडी लोग वैदिक यज्ञों के बहाने पशुओं का बध कर रहे थे तो भगवान् बुद्ध ने कहा, “यदि वेद पशु-वध की आज्ञा देते हैं, तो मैं वैदिक नियमों को नहीं मानता।” इस प्रकार उन्होंने उन लोगों की रक्षा की जो वैदिक नियमों का पालन कर रहे थे। अत: मनुष्यों को चाहिए कि भगवान् बुद्ध की शरण में जाँय जिससे वे वैदिक आज्ञाओं का दुरुपयोग न करें।

कल्कि अवतार हिंस्र अवतार है, जो कलियुग में उत्पन्न नास्तिकों के विनाश के लिए है। अब कलियुग के इस प्रारम्भ काल में अनेक अधर्म व्याप्त हैं और ज्यों-ज्यों कलियुग आगे बढ़ेगा अनेकानेक छद्म धार्मिक सिद्धान्तों का प्रवेश होता जायेगा और लोग भगवान् कृष्ण द्वारा बताये गये उन असली धार्मिक नियमों को भूलते जायेंगे, जिन्हें उन्होंने कलियुग के प्रारम्भ होने के पूर्व ही कहा था। ये नियम थे भगवान् के चरणकमलों में आत्मसमर्पण। दुर्भाग्यवश कलियुग के कारण, मूर्ख व्यक्ति कृष्ण के चरणकमलों की शरण नहीं लेते हैं यहाँ तक कि अधिकांश ऐसे व्यक्ति भी जो अपने को वैदिक धर्म का पालन करने वाले बताते हैं, वास्तव में वैदिक नियमों के विरोधी हैं। आये दिन वे नये-नये धर्मों को गढ़ते रहते हैं और कहते रहते हैं कि मुक्ति का मार्ग यही है। नास्तिक मनुष्य प्राय: कहते हैं—यत मत तत पथ। इसके अनुसार मनुष्य समाज में सैकड़ों-हजारों मत-मतान्तर हैं जिनमें से प्रत्येक वैध है। दुष्टों की इस विचारधारा से वेदवर्णित धार्मिक नियमों की हत्या हो गई है और ज्यों-ज्यों कलियुग आगे बढ़ता जायेगा ऐसी विचारधाराएँ और बलवती होती जायेंगी। कलियुग के अन्तिम चरण में केशव का सबसे हिंस्र अवतार कल्किदेव के रूप में होगा जो समस्त नास्तिकों का वध करके केवल भगवान् के भक्तों की रक्षा करेगा।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥