श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 31

 
श्लोक
यथा हि भगवानेव वस्तुत: सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन न: सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवा: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
यथा—जिस प्रकार; हि—निस्सन्देह; भगवान्—श्रीभगवान्; एव—निश्चय ही; वस्तुत:—अन्तिम रूप से; सत्—प्रकट; असत्—अप्रकट; च—तथा; यत्—जो भी; सत्येन—सत्य से; अनेन—यह; न:—हमारे; सर्वे—सभी; यान्तु—चले जाँय, दूर हों; नाशम्—संहार को; उपद्रवा:—उपद्रव ।.
 
अनुवाद
 
 यह सूक्ष्म तथा स्थूल दृश्य जगत भौतिक है, तो भी यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अभिन्न है, क्योंकि वस्तुत: वे ही समस्त कारणों के कारण हैं। कारण तथा कार्य वास्तव में एक ही हैं, क्योंकि कार्य में कारण विद्यमान रहता है। अत: परम सत्य श्रीभगवान् हमारे समस्त संकटों को अपने किसी भी शक्तिशाली अंग से नष्ट कर सकते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥