श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 34

 
श्लोक
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमध: समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंह: ।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजा: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
विदिक्षु—सभी कोनों में; दिक्षु—समस्त दिशाओं में (पूर्व, पश्चिम, उत्तर तथा दक्षिण) में; ऊर्ध्वम्—ऊपर; अध:—नीचे; समन्तात्—चारों ओर; अन्त:—भीतर; बहि:—बाहर; भगवान्—श्रीभगवान्; नारसिंह:—नृसिंह(आधे सिंह तथा आधे मनुष्य) देव के रूप में; प्रहापयन्—पूर्णतया विनष्ट करते हुए; लोक-भयम्—पशु, विष, आयुध, जल, वायु, अग्नि इत्यादि से उत्पन्न भय; स्वनेन—अपनी गर्जना से अथवा अपने भक्त प्रह्लाद महाराज के स्वर से; स्व-तेजसा—अपने निजी तेज से; ग्रस्त—आच्छादित; समस्त—अन्य सभी; तेजा:—प्रभाव ।.
 
अनुवाद
 
 प्रह्लाद महाराज ने भगवान् नृसिंहदेव के पवित्र नाम का उच्चस्वर से जप किया। अपने भक्त प्रह्लाद महाराज के लिए गर्जना करने वाले श्रीनृसिंहदेव! आप उन संकटों के भय से हमारी रक्षा करें जो विष, आयुध, जल, अग्नि, वायु इत्यादि के द्वारा समस्त दिशाओं में महा-भटों के द्वारा फैलाया जा चुका है। हे भगवान्! आप अपने दिव्य प्रभाव से इनके प्रभाव को आच्छादित कर लें। नृसिंहदेव समस्त दिशि-दिशाओं में, ऊपर-नीचे, बाहर भीतर हमारी रक्षा करें।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥