श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 8: नारायण-कवच  »  श्लोक 42

 
श्लोक
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतु: ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
एताम्—यह; विद्याम्—स्तोत्र; अधिगत:—प्राप्त; विश्वरूपात्—विश्वरूप ब्राह्मण से; शत-क्रतु:—स्वर्ग के राजा इन्द्र ने; त्रैलोक्य-लक्ष्मीम्—तीनों लोकों का समस्त ऐश्वर्य; बुभुजे—भोग किया; विनिर्जित्य—जीतकर; मृधे—युद्ध में; असुरान्—सभी असुरों को ।.
 
अनुवाद
 
 एक सौ यज्ञों को करने वाले राजा इन्द्र ने इस रक्षा-स्तोत्र को विश्वरूप से प्राप्त किया। असुरों को जीत लेने के बाद उसने तीनों लोकों के सभी ऐश्वर्य का भोग किया।
 
तात्पर्य
 विश्वरूप द्वारा स्वर्ग के राजा इन्द्र को प्रदत्त यह गुह्य मंत्रमय कवच इतना प्रभावशाली सिद्ध हुआ कि इन्द्र असुरों को जीत सका और अबाध रूप से तीनों लोकों का ऐश्वर्य भोग सका। इस प्रसंग में मध्वाचार्य का कहना है—
विद्या: कर्माणि च सदा गुरो: प्राप्ता: फलप्रदा:।

अन्यथा नैव फलदा: प्रसन्नोक्ता: फलप्रदा: ॥

मनुष्य को चाहिए कि प्रामाणिक गुरु से ही सभी प्रकार के मंत्र ग्रहण करे; अन्यथा मंत्र सफल नहीं होता। भगवद्गीता (४.३४) में भी ऐसा ही कहा गया है—

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: ॥

“सद्गुरु के शरणागत होकर दण्डवत् प्रणाम्, विनम्र जिज्ञासा तथा निष्कपट भाव से उनकी सेवा करके उस तत्त्व को जाने। तत्त्व को जानने वाले आत्मज्ञानी महापुरुष तेरे लिए ज्ञान का उपदेश दे सकते हैं” सभी प्रकार के मंत्रों को वैध गुरु से ग्रहण करना चाहिए और शिष्यों को चाहिए कि गुरु के चरणकमलों की शरण में जाकर उसे सभी प्रकार से प्रसन्न रखें। पद्मपुराण में यह भी कहा गया है—सम्प्रदायविहीना ये मन्त्रास्ते निष्फला मता:। शिष्य परम्पराएँ या सम्प्रदाय चार प्रकार के हैं—ब्रह्म सम्प्रदाय, रुद्र सम्प्रदाय, श्री सम्प्रदाय तथा कुमार सम्प्रदाय। यदि कोई आध्यात्मिक ज्ञान में अग्रसर होना चाहता है, तो उसे चाहिए कि वह इन प्रामाणिक सम्प्रदायों में से किसी से मंत्र ग्रहण करे अन्यथा वह आध्यात्मिक जीवन में कभी अग्रसर नहीं हो सकेगा।

 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के छठे स्कन्ध के अन्तर्गत “नारायण-कवच” नामक नामक आठवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥