श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  » 

 
 
संक्षेप विवरण:  इस अध्याय में बताया गया है कि स्वर्ग के राजा इन्द्र ने विश्वरूप का वध कर दिया, अत: विश्वरूप के पिता ने इन्द्र को मारने के लिए एक यज्ञ किया। जब उस यज्ञ से वृत्रासुर...
 
श्लोक 1:  श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—देवताओं के पुरोहित विश्वरूप के तीन सिर थे। इनमें से एक से वह सोमपान करता था, तो दूसरे से मदिरा पान और तीसरे से भोजन ग्रहण करता था। हे राजा परीक्षित! ऐसा मैंने विद्वानों से सुना है।
 
श्लोक 2:  हे महाराज परीक्षित! देवतागण विश्वरूप के पितापक्ष से सम्बन्धित थे, अत: विश्वरूप सबों के समक्ष अग्नि में घी की आहुति इन मंत्रों का उच्चारण करके दे रहा था—“इन्द्राय इदं स्वाहा” (“यह राजा इन्द्र के लिए है”) तथा “इदम् अग्नये” (यह अग्नि देव के लिए है)। वह मंत्र का उच्चारण उच्च स्वर से कर रहा था और प्रत्येक देवता को उसका उचित भाग प्रदान करता जा रहा था।
 
श्लोक 3:  वह यद्यपि देवताओं के नाम से यज्ञ की अग्नि में घी आहुति डाल रहा था, किन्तु देवताओं के बिना जताये वह असुरों के नाम की भी आहुति डालता जाता था, क्योंकि वे उसकी माता के पक्ष के सम्बंधी थे।
 
श्लोक 4:  किन्तु एक बार स्वर्ग के राजा इन्द्र को पता चल गया कि विश्वरूप देवताओं को धोखा देकर असुरों की आहुतियाँ दे रहा है। अत: वह असुरों द्वारा पराजित किये जाने से अत्यधिक भयभीत हो उठा और अतीव क्रोध में उसने विश्वरूप के तीनों सिरों को उसके कंधों से अलग कर दिया।
 
श्लोक 5:  तत्पश्चात् सोमरस पीनेवाला सिर पपीहे में, सुरापान करने वाला सिर गौरैया में और भोजन करने वाला सिर तीतर में बदल गया।
 
श्लोक 6:  इन्द्र इतना शक्तिशाली था कि यदि चाहता तो ब्रह्महत्या के पापफल को निरस्त कर सकता था, किन्तु उसने हाथ जोड़ कर पछताते हुए पाप-भार को स्वीकार कर लिया। उसने एक वर्ष तक यातना भोगी और तब अपनी शुद्धि के लिए हत्या के पाप को पृथ्वी, जल, वृक्ष तथा स्त्रियों में बाँट दिया।
 
श्लोक 7:  पृथ्वी ने, राजा इन्द्र से बदले में यह वरदान लेकर कि जहाँ कहीं भी गड्ढे होंगे वे समय पर अपने आप भर जायेंगे, ब्रह्महत्या के पापों का चतुर्थांश स्वीकार कर लिया। उन पापों के कारण ही हमें पृथ्वी पर अनेक मरुस्थल दिखाई पड़ते हैं।
 
श्लोक 8:  वृक्षों ने, इन्द्र से बदले में यह वरदान लिया कि काटे जाने पर भी उनकी शाखाएँ फिर से उग आयेंगी, ब्रह्महत्या के पापफल का चतुर्थांश ले लिया। ये पापफल वृक्षों से निकलने वाले रस के रूप में दिखाई पड़ते हैं (इसलिए इस रस को पीना वर्जित है)।
 
श्लोक 9:  स्त्रियों ने, इन्द्र से बदले में यह वरदान प्राप्त करके कि वे अपनी काम-वासनाओं को, जब तक वे भ्रूण के लिए हानिकर न हों, गर्भकाल में भी निरन्तर पूरी कर सकेंगी, पापफलों का चतुर्थांश स्वीकार कर लिया। फलस्वरूप स्त्रियों में प्रत्येक मास रजोदर्शन होता है।
 
श्लोक 10:  जल ने इन्द्र से बदले में यह वर प्राप्त करके कि किसी अन्य वस्तु में जल मिलाने से उसका आयतन बढ़ जायेगा, पापफलों का चतुर्थांश स्वीकार कर लिया। इसीलिए जल में बुलबुले तथा फेन उठते हैं। मनुष्य को चाहिए कि इन्हें हटाकर के ही जल भरे।
 
श्लोक 11:  विश्वरूप के वध के पश्चात् उसके पिता त्वष्टा ने इन्द्र को मारने के लिए अनुष्ठान किये। उसने अग्नि में यह उच्चारण करके आहुति डाली, “हे इन्द्र के शत्रु! तुम्हारी अभिवृद्धि हो, तुम अविलम्ब अपने शत्रु का वध करो।”
 
श्लोक 12:  तत्पश्चात् अन्वाहार्य नामक यज्ञ अग्नि के दक्षिणी कोने से एक भयावना व्यक्ति प्रकट हुआ जो युगान्त में समग्र ब्रह्माण्ड का विनाश करने वाले के समान प्रतीत हो रहा था।
 
श्लोक 13-17:  उस असुर का शरीर चारों दिशाओं में छोड़े हुए बाण के समान प्रतिदिन बढऩे लगा। वह लम्बा और काला था, मानो कोई जला हुआ पर्वत हो। वह संध्याकालीन बादलों के समूह की भाँति दीप्ति से युक्त था। असुर के शरीर के बाल तथा उसकी दाढ़ी-मूछें पिघले ताँबे के रंग की थीं। उसके नेत्र मध्यान्हकालीन सूर्य की भाँति भेदने वाले थे। वह दुर्जय था और ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो अपने प्रज्ज्वलित त्रिशूल पर तीनों लोकों को धारण किये हो। उच्चस्वर करके उसके नाचने और गाने से सारी पृथ्वी हिल उठी मानो भूकम्प आया हो। वह पुन: पुन: जम्हाई ले रहा था, मानो कन्दरा के समान अपने विशाल मुख में वह सारे आकाश को निगल जाना चाहत हो। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह आकाश के सभी तारों को अपनी जीभ से चाट रहा हो और अपने लम्बे पैने दाँतों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को खाने जा रहा हो। उस विराट असुर को देखकर सभी व्यक्ति डर के मारे इधर-उधर चारों दिशाओं में भागने लगे।
 
श्लोक 18:  उस अत्यन्त भयानक असुर ने, जो वास्तव में त्वष्टा का ही पुत्र था, अपने तप बल से सभी लोकों को आच्छादित कर लिया था। इसलिए वह वृत्र अर्थात् प्रत्येक वस्तु को आच्छादित करने वाला कहलाया।
 
श्लोक 19:  इन्द्र इत्यादि सभी देवता अपने सैनिकों सहित उस असुर पर टूट पड़े। वे अपने दिव्य धनुष-बाणों तथा अन्य हथियारों से उसे मारने लगे, किन्तु वृत्रासुर उनके सभी हथियार निगलता गया।
 
श्लोक 20:  उस असुर की शक्ति देखकर सभी देवता अत्यन्त आश्चर्यचकित तथा निराश हो गये और उनकी सारी शक्ति जाती रही। अत: वे सभी परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण की पूजा करके उन्हें प्रसन्न करने के निमित्त एकत्र हुए।
 
श्लोक 21:  देवताओं ने कहा—तीनों लोकों की सृष्टि पंचतत्त्वों—क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर—से हुई हैं, जिनको ब्रह्मा आदि विभिन्न देवता अपने वश में रखते हैं। हम काल से अत्यन्त भयभीत है कि वह हमारे अस्तित्त्व का अन्त कर देगा, इसलिए वह जैसा चाहता है हम वैसा कार्य करके उसको अपनी भेंट चढ़ाते हैं। किन्तु काल श्रीभगवान् से स्वयं डरता है। अत: हम उसी एकमात्र परमेश्वर की आराधना करें जो हमारी पूरी तरह से रक्षा कर सकता है।
 
श्लोक 22:  भगवान् समस्त सांसारिक कल्पना से रहित और सदैव विस्मयविहीन हैं, वे सदैव प्रसन्नचित्त एवं अपनी स्वरूप-सिद्धि से परम संतुष्ट रहने वाले हैं। उनकी कोई सांसारिक उपाधि नहीं होती, अत: वे स्थिर एवं विरक्त रहते हैं। वही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सबों के एकमात्र आश्रय हैं। अत: जो मनुष्य किसी अन्य से अपनी रक्षा की कामना करता है, वह अवश्य ही बड़ा मूर्ख है और कुत्ते की पूँछ पकड़ कर समुद्र को पार करना चाहता है।
 
श्लोक 23:  पहले राजा सत्यव्रत नामक मनु ने मत्स्य अवतार के सींग में समग्र ब्रह्माण्ड रूपी छोटी नौका को बाँधकर आत्मरक्षा की थी। उनकी कृपा से मनु ने बाढ़ के महान् संकट से अपने को बचाया था। वे ही मत्स्यावतार त्वष्टा के पुत्र से उत्पन्न इस गम्भीर संकट से हमारी रक्षा करें।
 
श्लोक 24:  सृष्टि के प्रारम्भ में प्रचण्ड वायु से बाढ़ के जल में भयानक लहरें उठने लगीं। इनसे ऐसा भयावना शोर हुआ कि ब्रह्माजी अपने कमल-आसन से प्रलय जल में प्राय: गिर ही पड़े, किन्तु भगवान् की सहायता से वे बच गये। उसी प्रकार हम भी भगवान् से इस भयावह स्थिति से अपनी रक्षा की आशा करते हैं।
 
श्लोक 25:  पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जिन्होंने अपनी बहिरंगा शक्ति से हमारी सृष्टि की और जिनकी कृपा से हम इस विश्व की सृष्टि का विस्तार करते हैं, वे निरन्तर हमारे समक्ष परमात्मा रूप में विद्यमान हैं, किन्तु हम उनके रूप को नहीं देख पाते। हम इसीलिए देखने में असमर्थ हैं, क्योंकि हम सभी अपने आपको पृथक् तथा स्वतंत्र ईश्वर के रूप में मानते हैं।
 
श्लोक 26-27:  पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी अचिन्त्य अन्तरंगा शक्ति से अनेक दिव्य शरीरों में विस्तार करते हैं, यथा देवताओं की शक्ति के अवतार वामनदेव, ऋषियों के अवतार परशुराम, पशुओं के अवतार नरसिंह देव एवं वराह और जलचरों के अवतार मत्स्य तथा कूर्म। वे सभी प्रकार की जीवात्माओं के बीच विभिन्न दिव्य देह धारण करते हैं और मनुष्यों के बीच विशेष रूप से भगवान् कृष्ण तथा राम के रुप में प्रकट होते हैं। अपनी अहैतुकी कृपा से वे असुरों द्वारा सदा सताये गये देवताओं की रक्षा करते हैं। वे समस्त जीवात्माओं के पूज्य श्रीविग्रह हैं। वे परम कारण हैं और स्त्री तथा पुरुष की सृजन शक्तियों के रूप में प्रकट होते हैं। यद्यपि वे इस ब्रह्माण्ड से पृथक् हैं, वे विराट रूप में विद्यमान रहते हैं। अत: अपनीइस भयभीत अवस्था में हमें चाहिए कि उनकी शरण ग्रहण करें क्योंकि हमें विश्वास है कि परमात्मा हमें अपना संरक्षण प्रदान करेंगे।
 
श्लोक 28:  श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा—हे राजन्! जब समस्त देवताओं ने उनकी प्रार्थना की तो श्रीभगवान् हरि शंख, चक्र तथा गदा धारण किये हुए पहले उनके अन्त:करण में और तब उनके सम्मुख प्रकट हुए।
 
श्लोक 29-30:  श्रीभगवान् को घेरे हुए उनके सोलह पार्षद उनकी सेवा कर रहे थे। वे आभूषणों से अलंकृत थे और भगवान् के ही समान लग रहे थे, किन्तु श्रीवत्स चिन्ह तथा कौस्तुभमणि से रहित थे। हे राजन्! जब देवताओं ने उस मुद्रा में शरत्कालीन कमल की पंखडिय़ों के समान नेत्रों वाले स्मित हास से युक्त श्रीभगवान् को देखा तो वे प्रसन्नता से अभिभूत हो गये और उन्होंने तुरन्त पृथ्वी पर गिर कर दण्डवत् प्रणाम किया। फिर वे धीरे-धीरे उठे और अपनी स्तुतियों द्वारा उन्होंने भगवान् को प्रसन्न किया।
 
श्लोक 31:  देवताओं ने कहा—हे भगवन्! आप यज्ञ फल को देने में समर्थ हैं। आप ही वह काल हैं, जो इन फलों को कालान्तर में नष्ट कर देता है। आप असुरों को मारने के लिए चक्र को चलाते हैं। हे अनेक नामधारण करनेवाले भगवान्! हम लोग आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 32:  हे परम नियामक! आप तीनों गन्तव्यों [स्वर्ग लोक में पहुँचना, मनुष्य के रूप में जन्म तथा नरक में यातना] को वश में रखने वाले हैं, फिर भी आपका परम धाम वैकुण्ठलोक है। चूँकि आपके द्वारा इस दृश्य जगत की उत्पत्ति के बाद हम प्रकट हुए हैं, अत: हम आपके कार्यकलापों को समझने में असमर्थ हैं। अत: हमारे पास आपको अर्पित करने के लिए नमस्कार करने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।
 
श्लोक 33:  हे भगवन्, हे नारायण, हे वासुदेव, हे आदि पुरुष, परम अनुभव, साक्षात् मंगल! हे परम वरदान स्वरूप अत्यन्त कृपालु तथा अपरिवर्तनीय! हे दृश्य जगत के आधार, हे समस्त लोकों तथा प्रत्येक पदार्थ के स्वामी तथा लक्ष्मी देवी के पति! आपका साक्षात्कार श्रेष्ठ संन्यासी ही कर पाते हैं, जो भक्तियोग में पूर्णतया समाधिमग्न होकर सारे विश्व में कृष्णभावनामृत का उपदेश देते हैं। वे अपने ध्यान को आप में ही केन्द्रीभूत रखते हैं, अत: अपने शुद्ध अन्त:करण में आपके स्वरूप को ग्रहण करते हैं। जब उनके हृदयों का अंधकार पूर्णतया हट जाता है और आपका साक्षात्कार होता है तब उन्हें आपके दिव्य स्वरूप का दिव्य आनन्द प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्तियों के सिवाय और कोई आप का अनुभव नहीं कर पाता, अत: हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 34:  हे भगवन्! आपको किसी आश्रय की आवश्यकता नहीं है। भौतिक शरीर से रहित होने पर भी आपको हमारे सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती। चूँकि आप इस दृश्य जगत के कारण हैं और अपरिवर्तित रूप में ही इसके भौतिक अवयवों की पूर्ति करते हैं, अत: आप स्वत: इसकी सृष्टि, पालन तथा संहार करते हैं। तो भी भौतिक कार्यों में व्यस्त प्रतीत होते हुए भी आप समस्त भौतिक गुणों से परे हैं। अत: आपके दिव्य कार्य कलापों को समझ पाना कठिन है।
 
श्लोक 35:  ये ही हमारी जिज्ञासाएँ हैं। सामान्य बद्धजीव भौतिक नियमों के अधीन है और उसे अपने कर्मों का फल मिलता है। क्या आप भौतिक गुणों से उत्पन्न शरीर में सामान्य मनुष्यों की भाँति इस संसार में उपस्थित रहते हैं? क्या आप काल, पूर्व कर्म आदि के वशीभूत होकर अच्छे या बुरे कर्मों को भोगते हैं? अथवा, इसके विपरीत क्या आप ऐसे उदासीन साक्षी के रूप में यहाँ उपस्थित हैं, जो आत्मनिर्भर, समस्त भौतिक इच्छाओं से रहित तथा आध्यात्मिक शक्ति से सदैव परिपूर्ण रहता है? हम निश्चित रूप से आपकी वास्तविक स्थिति को नहीं समझ सकते।
 
श्लोक 36:  हे भगवन्! सभी विरोधों का आप में तिरोधान होता है। हे ईश्वर! चूँकि आप परम पुरुष, अनन्त दिव्य गुणों के आगार, परम नियन्ता हैं, अत: आपकी असीम महिमा बद्धजीवों की कल्पना के परे है। अनेक सिद्धान्तवादी बिना जाने कि वास्तव में सच क्या है, सत्य तथा मिथ्या के विषय में तर्क करते हैं। उनके तर्क झूठे होते हैं और फैसले अनिर्णीत, क्योंकि उनके पास आपको जानने का कोई वैध प्रमाण नहीं है। चूँकि उनके मन धर्म ग्रंथों के झूठे निष्कर्षों से विक्षुब्ध रहते हैं, अत: वे यह नहीं समझ पाते कि सत्य क्या है। यही नहीं, सही सही निष्कर्ष प्राप्त करते समय उनकी उत्कण्ठा दूषित रहती है, जिससे उनके सिद्धान्त आपका वर्णन करने में असमर्थ रहते हैं, क्योंकि आप उनकी भौतिक बुद्धि से परे हैं। आप अद्वितीय हैं, अत: आप में करणीय तथा अकरणीय, सुख तथा दुख जैसे विरोध नहीं हैं। आपकी उस शक्ति के द्वारा आपके लिए क्या असम्भव है? आपकी स्वाभाविक स्थिति द्वैत से रहित है, अत: आप अपनी शक्ति के प्रभाव से सब कुछ कर सकते हैं।
 
श्लोक 37:  मोहग्रस्त पुरुष रस्सी को सर्प मान बैठता है, अत: उसे रस्सी भय उत्पन्न करती है, किन्तु समुचित बुद्धि वाले मनुष्य में रस्सी ऐसा नहीं कर पाती क्योंकि वह इसे केवल रस्सी ही जानता है। इसी प्रकार सबों के हृदयों में उनकी बुद्धि के ही अनुसार परमात्मा-स्वरूप आप भय या निर्भीकता का भाव उत्पन्न करने वाले हैं, किन्तु आप स्वयं अद्वैत हैं।
 
श्लोक 38:  विचार-विमर्श से यह देखा जा सकता है कि परमात्मा यद्यपि विभिन्न प्रकार से प्रकट होते हैं, किन्तु प्रत्येक वस्तु के मूल तत्त्व वे ही हैं। सम्पूर्ण भौतिक शक्ति इस संसार का कारण है, किन्तु यह शक्ति उन्हीं से उद्भूत है, अत: वे ही समस्त कारणों के कारण हैं और बुद्धि तथा इन्द्रियों के प्रकाशक हैं। वे प्रत्येक वस्तु में परमात्मा रूप में देखे जाते हैं। उनके बिना प्रत्येक वस्तु मृत हो जायेगी। परमात्मा रूप में आप परम नियन्ता ही एकमात्र शेष बचे हैं।
 
श्लोक 39:  अत: हे मधुसूदन! जिन्होंने आपकी महिमा के समुद्र की एक भी अमृतमयी बूँद को चख लिया है, उनके मन में निरन्तर आनन्द की धारा प्रवाहित होती रहती है। ऐसे महात्मा भक्त दृश्य तथा श्रवणेन्द्रियों से उत्पन्न होने वाले तथाकथित भौतिक सुख की झलक को भूल जाते हैं। ऐसे भक्त समस्त इच्छाओं से मुक्त होकर सभी जीवात्माओं के वास्तविक मित्र होते हैं। वे अपने मन को आप में समर्पित करके दिव्य आनन्द उठाते हुए जीवन के असली उद्देश्य को प्राप्त करने में कुशल होते हैं। हे भगवन्! आप ऐसे भक्तों के, जिन्हें इस भौतिक जगत में कभी वापस नहीं आना पड़ता, प्रिय मित्र एवं आत्मा हैं। भला वे आपकी भक्ति को किस प्रकार त्याग सकते हैं?
 
श्लोक 40:  हे भगवन्, हे साक्षात् त्रिलोकी, तीनों लोकों के जनक! हे वामन अवतार के रूप में तीनों लोकों के पराक्रम! हे नृसिंहदेव के त्रि-नेत्र रूप, हे तीनों लोकों में परम सुन्दर पुरुष! प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक प्राणी जिसमें मनुष्य तथा दैत्य और दानव भी सम्मिलित हैं, आपके ही शक्ति के अंश हैं। हे परम शक्तिमान! जब-जब असुर शक्तिशाली हुए हैं तब-तब आप उन्हें दण्ड देने के लिए विभिन्न अवतारों के रूप में प्रकट हुए हैं। आप भगवान् वामनदेव, राम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुए हैं। कभी आप पशु के रूप में प्रकट होते हैं यथा भगवान् वराह, तो कभी मिश्रित अवतार के रूप में यथा भगवान् नृसिंहदेव तथा भगवान् हयग्रीव और कभी जलचर रूप में यथा भगवान् मस्य तथा भगवान् कूर्म। आपने ऐसे अनेक रूप धारण करके सदैव असुरों तथा दानवों को दण्ड दिया है। अत: हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप यदि आवश्यक समझें तो महा असुर वृत्रासुर को मारने के लिए आज किसी अन्य अवतार के रूप में प्रकट हों।
 
श्लोक 41:  हे परम रक्षक, हे पितामह, हे परम पवित्र, हे परमेश्वर! हम सभी आपके चरणकमलों पर समर्पित हैं। दरअसल, हमारे मन ध्यान में प्रेम-पाश द्वारा आपके चरणाविन्द से बँधे हुए हैं। अब आप अपना अवतार-रूप प्रकट कीजिये। हमें आप अपना शाश्वत दास तथा भक्त मानकर हम पर प्रसन्न हों और हमारे ऊपर दया करें। आप अपनी प्रेमपूर्ण चितवन, शीतल तथा दयापूर्ण मनमोहक हँसी तथा सुन्दर मुख से झरने वाले अमृत शब्दों से हम सबों की उस चिन्ता को दूर करें जो वृत्रासुर के कारण उत्पन्न हुई है और सदैव हमारे हृदयों को कष्ट देती है।
 
श्लोक 42:  हे भगवान्! जिस प्रकार अग्नि की छोटी-छोटी चिनगारियाँ पूर्ण (आदि) अग्नि का कार्य करने में असमर्थ हैं, वैसे ही आपकी चिनगारी रूप हम सभी अपने जीवन की आवश्यकता बता पाने में अक्षम हैं। आप पूर्ण ब्रह्म हैं, अत: हमें आपको बताने की क्या आवश्यकता? आप सब कुछ जानने वाले हैं क्योंकि आप दृश्य जगत के आदि कारण, इसके पालक तथा सम्पूर्ण सृष्टि के संहर्ता हैं। आप अपनी दिव्य तथा भौतिक शक्तियों से लीलाएँ करते रहते हैं क्योंकि आप ही इन समस्त शक्तियों के नियामक हैं। आप इन विभिन्न शक्तियों के नियामक हैं। आप सभी जीवों के भीतर दृश्य सृष्टि में और उस से परे भी रहते हैं। आप अन्त:करणों में परब्रह्म के रुप में और बाह्यत: भौतिक सृष्टि के अवयवों के रूप में स्थित हैं। अत: यद्यपि आप विभिन्न अवस्थाओं, विभिन्न कालों तथा स्थानों और विभिन्न देहों में प्रकट होते रहते हैं, तो भी हे भगवन्! आप ही समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वास्तव में आप ही मूल तत्त्व हैं। आप समस्त गतिविधियों के साक्षी हैं, किन्तु आकाश के समान महान् होने के कारण किसी के द्वारा स्पृश्य नहीं हैं। आप परब्रह्म तथा परमात्मा के रूप में प्रत्येक वस्तु के साक्षी हैं। हे भगवान्! आपसे कुछ भी छिपा नहीं है।
 
श्लोक 43:  हे भगवान्! आप सर्वज्ञाता हैं, अत: आप अच्छी तरह जानते हैं कि हम आपके चरणकमलों की शरण में क्यों आये हैं, जिनकी छाया समस्त भौतिक अशान्तियों से छुटकारा दिलाने वाली है। चूँकि आप परम गुरु हैं और सब कुछ जानते हैं, अत: हमने आदेश प्राप्त करने के लिए आपके चरणकमलों का आश्रय लिया है। कृपया हमारे वर्तमान दुखों को दूर करके हमें शरण दीजिये। आपके चरणकमल ही पूर्ण समर्पित भक्त के एकमात्र आश्रय हैं और इस भौतिक जगत के संतापों को शमित करने के एकमात्र साधन हैं।
 
श्लोक 44:  अत: हे परम नियन्ता, हे भगवान् श्रीकृष्ण! त्वष्टा के पुत्र इस घातक असुर वृत्रासुर का संहार कीजिये। जिसने हमारे समस्त शस्त्रास्त्र, युद्ध की सारी सामग्री तथा हमारे बल और तेज को निगल रखा है।
 
श्लोक 45:  हे भगवान्! हे परम शुद्ध! आप सबों के अन्त:स्थल में रहते हैं और बद्धजीवों की समस्त आकांक्षाओं तथा गतिविधियों का निरीक्षण करते हैं। श्रीकृष्ण के रूप में विख्यात हे भगवान्! आपका यश अत्यन्त प्रकाशमान है। आपका आदि नहीं है क्योंकि आप प्रत्येक वस्तु के उद्गम हैं। शुद्ध भक्त इससे परिचित हैं क्योंकि आप शुद्ध तथा सत्यनिष्ठ के लिए सुगम हैं। जब करोड़ों वर्षों तक भौतिक जगत में भटकने के बाद बद्धात्माएँ आपके चरणकमलों पर मुक्त होकर शरण पाती हैं, तो उन्हें जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है। अत: हे भगवान्! हम आपके चरणारविन्द को सादर नमस्कार करते हैं।
 
श्लोक 46:  श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा—हे राजा परीक्षित! जब देवताओं ने इस प्रकार से भगवान् की सच्ची स्तुति की तो उसे उन्होंने कृपापूर्वक सुना और प्रसन्न होकर देवताओं को उत्तर दिया।
 
श्लोक 47:  श्रीभगवान् ने कहा—हे प्यारे देवो! तुम लोगों ने अत्यन्त ज्ञानपूर्वक मेरी स्तुति की है, जिससे मैं तुम लोगों से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मनुष्य ऐसे ज्ञान के कारण मुक्त हो जाता है और मेरे उच्च पद को स्मरण करता रहता है, जो भौतिक जीवन की स्थितियों के ऊपर है। ऐसा भक्त पूर्ण ज्ञान में रहकर स्तुति करने पर शुद्ध हो जाता है। मेरी भक्ति करने का यही स्त्रोत है।
 
श्लोक 48:  हे बुद्धिमान देवताओं में श्रेष्ठ! यद्यपि यह सत्य है कि मेरे प्रसन्न हो जाने पर किसी के लिए कुछ भी प्राप्त कर लेना कठिन नहीं है, तो भी शुद्ध भक्त, जिसका मन विशिष्ठ भाव से मुझ पर स्थिर है, वह मेरी भक्ति में निरत रहने के अवसर के अतिरिक्त मुझसे और कुछ भी नहीं माँगता।
 
श्लोक 49:  जो लोग भौतिक सम्पत्ति को ही सब कुछ या जीवन का परम ध्येय मानते हैं, वे कृपण कहलाते हैं। वे आत्मा की परम आवश्यकता (हित) को नहीं जानते। यही नहीं, यदि कोई ऐसे मूर्खों की इच्छा की पूर्ति करता है, उसे भी मूर्ख समझना चाहिए।
 
श्लोक 50:  भक्तियोग में दक्ष शुद्ध भक्त कभी भी मूर्ख पुरुष को भौतिक सुख के लिए सकाम कर्म करने का उपदेश नहीं देगा, ऐसे कार्यों में सहायता करना तो दूर रहा। ऐसा भक्त उस अनुभवी वैद्य के समान है, जो रोगी के चाहने पर भी उसे ऐसा पथ्य ग्रहण करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता जो उसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो।
 
श्लोक 51:  हे मघवा (इन्द्र)! तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हें महान् साधु दध्यञ्च (दधीचि) के पास जाने की राय देता हूँ। वे ज्ञान, व्रत तथा तपस्या में अत्यन्त सिद्ध हैं और उनका शरीर अत्यन्त सुदृढ़ है। अब देर न लगाओ। उनके पास जाकर उनका शरीर माँगो।
 
श्लोक 52:  ऋषि दध्यञ्च ने जो दधीचि के नाम से भी विख्यात हैं ब्रह्मज्ञान को आत्मसात् किया था और फिर उसे अश्विनीकुमारों को दिया। कहा जाता है कि दध्यञ्च ने उनको अश्वमुख (घोड़े के मुँह) से मंत्र दिये इसलिए वे मंत्र अश्वशिर कहलाते हैं। ऋषि दधीचि से ये मंत्र प्राप्त कर अश्विनीकुमार जीवनमुक्त हो गये।
 
श्लोक 53:  दध्यञ्च का नारायण-कवच नामक अभेद्य कवच त्वष्टा को मिला जिसने इसे अपने पुत्र विश्वरूप को दिया और जिससे तुमने इसे प्राप्त किया है। इस नारायण-कवच के कारण दधीचि का शरीर अब अत्यन्त पुष्ट है। अत: तुम जाकर उनसे उनका शरीर माँग लो।
 
श्लोक 54:  जब तुम्हारी ओर से अश्विनीकुमार दधीचि का शरीर माँगेंगे, तो वे स्नेहवश अवश्य दे देंगे। इसमें सन्देह मत करो, क्योंकि दधीचि धर्म के ज्ञानी हैं। जब दधीचि तुम्हें अपना शरीर दे देंगे तो विश्वकर्मा उनकी हड्डियों (अस्थियों) से एक वज्र तैयार कर देगा। यह वज्र मेरी शक्ति से युक्त होने के कारण निश्चित रूप से वृत्रासुर का वध करेगा।
 
श्लोक 55:  जब वृत्रासुर मेरे आत्मबल (ब्रह्मतेज) से मर जायेगा, तो तुम्हें पुन: अपना तेज आयुध तथा सम्पत्ति प्राप्त हो जायेगी। इस प्रकार तुम सबका कल्याण होगा। यद्यपि वृत्रासुर तीनों लोकों को विनष्ट कर सकता हैं, किन्तु तुम मत डरो कि वह तुम्हें हानि पहुँचायेगा। वह भी भक्त है और तुमसे कभी भी विद्वेष नहीं करेगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥