श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 11

 
श्लोक
हतपुत्रस्ततस्त्वष्टा जुहावेन्द्राय शत्रवे ।
इन्द्रशत्रो विवर्धस्व मा चिरं जहि विद्विषम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
हत-पुत्र:—जिसका पुत्र मर चुका है; तत:—तत्पश्चात्; त्वष्टा—त्वष्टा ने; जुहाव—यज्ञ किया; इन्द्राय—इन्द्र के लिए; शत्रवे—एक शत्रु उत्पन्न करने के लिए; इन्द्र-शत्रो—हे इन्द्र के शत्रु; विवर्धस्व—बढ़ो; मा—मत; चिरम्—दीर्घकाल के बाद; जहि—मारो; विद्विषम्—अपना शत्रु ।.
 
अनुवाद
 
 विश्वरूप के वध के पश्चात् उसके पिता त्वष्टा ने इन्द्र को मारने के लिए अनुष्ठान किये। उसने अग्नि में यह उच्चारण करके आहुति डाली, “हे इन्द्र के शत्रु! तुम्हारी अभिवृद्धि हो, तुम अविलम्ब अपने शत्रु का वध करो।”
 
तात्पर्य
 त्वष्टा के द्वारा उच्चरित मंत्र में कुछ त्रुटि रह गई थी, क्योंकि उसने ह्रस्व के बजाय दीर्घ स्वर में उच्चारण किया जिससे मंत्र का अर्थ बदल गया था। त्वष्टा इन्द्र शत्रो शब्द का उच्चारण करना चाहता था जिसका अर्थ है “हे इन्द्र के शत्रु।” इस मंत्र में इन्द्र सम्बन्ध कारक (षष्ठी) में आया है
और इन्द्रशत्रो में तत्पुरुष समास कहलाता है। दुर्भाग्यवश त्वष्टा ने इस मंत्र का थोड़े समय के बजाय देर तक उच्चारण किया जिससे उसका अर्थ “इन्द्र के शत्रु” से बदलकर, “इन्द्र, जो शत्रु है” हो गया। फलस्वरूप इन्द्र का शत्रु न प्रकट होकर वृत्रासुर का शरीर प्रकट हुआ, जिसका शत्रु इन्द्र था।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥