श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 6: मनुष्य के लिए विहित कार्य  »  अध्याय 9: वृत्रासुर राक्षस का आविर्भाव  »  श्लोक 12

 
श्लोक
अथान्वाहार्यपचनादुत्थितो घोरदर्शन: ।
कृतान्त इव लोकानां युगान्तसमये यथा ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—तदनन्तर; अन्वाहार्य-पचनात्—अन्वाहार्य नामक अग्नि से; उत्थित:—निकला; घोर-दर्शन:—अत्यन्त भयानक लगने वाला; कृतान्त:—साक्षात् प्रलय; इव—सदृश; लोकानाम्—समस्त लोकों का; युग-अन्त—कल्पान्त; समये— समय पर; यथा—जिस प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् अन्वाहार्य नामक यज्ञ अग्नि के दक्षिणी कोने से एक भयावना व्यक्ति प्रकट हुआ जो युगान्त में समग्र ब्रह्माण्ड का विनाश करने वाले के समान प्रतीत हो रहा था।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥